- हाल ही में, चैतू (उर्फ श्याम दादा) — जो 2013 के Jhiram Ghati attack का मुख्य मास्टरमाइंड माना जाता था — और अनंत समेत कई अन्य नक्सलियों ने हथियार छोड़कर सरेंडर कर दिया।
- इनके साथ लगभग 10 या उससे अधिक काडर (नक्सली साथियों) ने भी आत्मसमर्पण किया।
- यह घटना सिर्फ एक सरेंडर नहीं है — इसे राज्य पुलिस/प्रशासन की बड़ी कामयाबी माना जा रहा है क्योंकि यह “गहरे” नक्सल नेटवर्क और लंबा समय से सक्रिय झीरम-घाटी नेटवर्क को नुकसान पहुँचाती है
📢 विजय शर्मा का बयान — नक्सलवाद खत्म होना: क्या कहा?
सरेंडर के बाद, उप मुख्यमंत्री व गृह मंत्री विजय शर्मा ने मीडिया से कहा:
- उनका दावा है कि अब तक छत्तीसगढ़ में करीब 80 % नक्सलवाद समाप्त हो चुका है।
- उन्होंने कहा कि शेष “लगभग 20 %” नक्सलवाद को भी “निर्धारित समय” (सरकार के लक्ष्य) के भीतर पूरी तरह समाप्त कर दिया जाएगा
- उन्होंने इस समीक्षा को सिर्फ मायने नहीं, बल्कि “असली जमीन” बताया: चैतू-अनंत जैसे “कुलेडर” (वरिष्ठ नक्सली) का सरेंडर खुद इस बदलाव की पुष्टि है।
- साथ ही उन्होंने यह कहा कि राज्य सरकार ने नक्सलियों को “रेड-कारपेट” (सुरक्षा + पुनर्वास + भविष्य) देने की नीति अपनाई है — जो हथियार छोड़कर वापस आने वाले लोगों को सामाजिक पुनर्संतुलन का मौका देती है।
- उन्होंने विकास-परिकल्पना, युवाओं को मौका देने और आदिवासी/स्थानीय समुदायों के संसाधनों (जल, जंगल, जमीन) पर अधिकार सुनिश्चित करने की बात भी दोहराई है — ताकि “नक्सली विचारधारा” वापस न लौटे।

🎯 प्रशासन व सरकार की रणनीति: सशक्त दबाव + पुनर्वास
जहां एक ओर सुरक्षा-बलों (पुलिस/सीआरपीएफ आदि) की सक्रियता, इलाके की निगरानी व छापेमारी जारी है — वहीं दूसरी ओर — हथियार छोड़कर आने वालों के लिए पुनर्वास नीति, सामाजिक पुन: समायोजन, और विकास योजनाओं के जरिए “नया जीवन” देने की पहल है।
सरकारी लाइन है कि ये दो पहलू अलग नहीं, बल्कि साथ-साथ चलेंगे — यानी डर + सुरक्षा + भरोसा, तीनों।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि जिन नक्सलियों (या हथियारबंद समूहों) ने हथियार नहीं छोड़े, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई जारी रहेगी — पुनर्वास केवल उन्हीं के लिए है जो आत्मसमर्पण करें।
🧮 इसका मतलब — क्या समझा जाए?
- चैतू-अनंत जैसे बड़े नामों का सरेंडर यह संकेत दे रहा है कि लंबे समय से चल रहे नक्सली नेटवर्क में दरार आ चुकी है — संभवतः डर, थकावट, स्थानीय असंतोष, सरकारी दबाव या विश्वास-वापसी की वजह से।
- यदि सरकार व सुरक्षा बल अपनी रणनीतियाँ जारी रखते हैं — “दबाव + पुनर्वास + विकास” — तो सच्चाई में नक्सलवाद का दायरा सीमित होता जा रहा है।
- पुनर्वास + विकास + स्थानीय लोगों को अधिकार देने की नीति, यह दिखाती है कि “सिर्फ हथियारबंद संघर्ष” नहीं, बल्कि “समाज-निर्माण + बेहतर जीवन” भी लक्ष्य है — जो दीर्घकाल में ठहराव दे सकता है।
- लेकिन यह पूरा 100% खत्म होने की गारंटी नहीं — अभी “20 % बचे” कहे जा रहे हैं; इसलिए निगरानी, स्थानीय सहभागिता, प्रशासन की सतर्कता, सुशासन और विकास की निरंतरता अहम होगी।
📰 हालात की संवेदनशीलता — किन बातों पर नजर रखने की जरूरत
- नक्सलियों की आत्मसमर्पण / पुनर्वास प्रक्रिया हो रही है, लेकिन जनता को यह देखना होगा कि पुनर्वास कितनी प्रभावी है — कहीं समाज में वापस लौटने पर उन्हें तिरस्कार, असुरक्षा न हो।
- साथ ही — राज्य सरकार और सुरक्षा एजेंसियाँ यह सुनिश्चित करें कि नए नक्सली/दूरदराज नेटवर्क फिर से सक्रिय न हो जाएँ।
- विकास योजनाओं, आदिवासी और स्थानीय समुदायों के हितों, जंगल-जमीन–जल के अधिकारों, और क्षेत्रीय रोजगार-अवसरों पर पूरा ध्यान रखें — ताकि नक्सलवाद का कोई नया आधार न बने।
- मीडिया, नागरिक समाज और स्थानीय जन प्रतिनिधियों की निगरानी — ताकि प्रशासन व सरकार की नीतियाँ पारदर्शी रहें।
