बस्तर संभाग में पृथक बस्तर राज्य की मांग एक बार फिर जमीनी स्तर पर जोर पकड़ती हुई नजर आ रही है। लंबे समय के अंतराल के बाद गांव-गांव से राजनीतिक चेतना उभर रही है और आदिवासी क्षेत्रों में इस मुद्दे पर संगठित पहल शुरू हो गई है।

ग्राम पंचायतों से उठी मांग
जगदलपुर से लगे तोकापाल ब्लॉक में इस आंदोलन की शुरुआत हुई है, जहां 18 ग्राम पंचायतों को मिलाकर एक संघर्ष समिति का गठन किया गया है।
ग्राम पंचायत पथरीली उड़वा की ग्रामसभा में सर्वसम्मति से पृथक बस्तर राज्य की मांग का प्रस्ताव पारित किया गया। यह प्रस्ताव पेसा दिवस के अवसर पर पारित किया गया, जिसके बाद से पंचायत स्तर पर इसे व्यापक समर्थन मिल रहा है।
अधिकारों की लड़ाई बता रहे नेता
संघर्ष समिति के अध्यक्ष बामन पोयाम ने कहा कि यह आंदोलन किसी राजनीतिक दल के दबाव में नहीं, बल्कि बस्तर के मूल निवासियों के अधिकारों की लड़ाई है।
वहीं समिति के सचिव पाकलू पोड़ियाम ने स्पष्ट किया कि फिलहाल उनकी प्राथमिक मांग छठवीं अनुसूची को लागू कराना है, ताकि आदिवासी क्षेत्रों को संवैधानिक संरक्षण मिल सके। उनका कहना है कि छठवीं अनुसूची लागू होने से स्थानीय स्वशासन, जमीन, जंगल और संसाधनों पर आदिवासियों का अधिकार मजबूत होगा।
31 दिसंबर को बड़ी बैठक
इस आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए 31 दिसंबर को मावलीभाटा में 18 पंचायतों की एक बड़ी बैठक प्रस्तावित है। इस बैठक में—
- आंदोलन की आगे की रणनीति,
- जनसमर्थन को और मजबूत करने की योजना,
- तथा भविष्य में संभावित आंदोलनात्मक कार्यक्रमों पर चर्चा की जाएगी।
पहले भी दिख चुका है जनआंदोलन
गौरतलब है कि यह क्षेत्र पहले भी औद्योगिक परियोजनाओं के खिलाफ एकजुट होकर आंदोलन कर चुका है।
- डॉयकेम परियोजना
- और अल्ट्रा मेगा स्टील प्लांट के विरोध में यहां व्यापक जनआंदोलन हुए थे, जिनमें ग्रामसभाओं की अहम भूमिका रही थी।
राजनीतिक विमर्श में लौटी मांग
अब एक बार फिर पृथक बस्तर राज्य की मांग राजनीतिक और सामाजिक विमर्श में लौटती दिख रही है। गांव-गांव में प्रस्ताव पारित होना और संघर्ष समिति का गठन यह संकेत दे रहा है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा और व्यापक रूप ले सकता है।
बस्तर में उभर रही यह नई राजनीतिक चेतना राज्य की राजनीति में क्या असर डालेगी, यह तो आने वाला समय बताएगा, लेकिन फिलहाल यह साफ है कि पृथक बस्तर राज्य की मांग फिर से जमीनी हकीकत बनती जा रही है।
