भोपाल
महाभारत एक ऐसा महाकाव्य है जिसे हम वर्षों से सुनते और देखते आ रहे हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि उस युग में इस्तेमाल होने वाले ब्रह्मास्त्र, वरुणास्त्र और अग्नेयास्त्र जैसे विनाशकारी हथियार आखिर काम कैसे करते थे? क्या ये सिर्फ कल्पना थे या इनके पीछे कोई ठोस वैज्ञानिक सोच भी थी?

इन सवालों के जवाब तलाशने की एक अनोखी कोशिश की गई है भोपाल के भारत भवन में आयोजित महाभारत समागम के दौरान, जहां प्राचीन युद्ध शस्त्रों की दुर्लभ प्रतिकृतियां प्रदर्शित की गई हैं। ये प्रतिकृतियां इंदौर के कलाकार राज बेंद्रे द्वारा कई वर्षों की रिसर्च के बाद तैयार की गई हैं।
प्रदर्शनी में ऐसे दिव्यास्त्रों के मॉडल रखे गए हैं, जिनका उल्लेख महाभारत के युद्ध प्रसंगों में मिलता है। कलाकार का दावा है कि इन शस्त्रों की बनावट, संरचना और संचालन प्रणाली को ग्रंथों, श्लोकों और ऐतिहासिक विवरणों के आधार पर समझने का प्रयास किया गया है।
राज बेंद्रे का कहना है कि प्राचीन भारत में युद्ध केवल शक्ति का नहीं बल्कि विज्ञान, रणनीति और तकनीक का भी प्रतीक था। कई अस्त्र ऐसे थे जो प्राकृतिक शक्तियों — जैसे अग्नि, जल, वायु और ध्वनि — के सिद्धांतों पर आधारित माने जाते हैं, जिन्हें आज के आधुनिक विज्ञान से जोड़कर भी देखा जा सकता है।
प्रदर्शनी में आए दर्शकों के लिए यह अनुभव किसी इतिहास की किताब से कहीं ज्यादा जीवंत है, जहां वे महाभारत के युद्ध विज्ञान को नजदीक से समझ पा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे प्रयास युवाओं को भारतीय ज्ञान परंपरा और प्राचीन विज्ञान के प्रति जागरूक करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
महाभारत समागम में यह प्रदर्शनी न सिर्फ कला का उदाहरण है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करती है कि क्या प्राचीन भारत में तकनीक और युद्ध विज्ञान उतना ही उन्नत था, जितना ग्रंथों में वर्णित है।
