दंतेवाड़ा। कभी नक्सलवाद का गढ़ माने जाने वाला Dantewada अब निर्णायक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। नक्सल प्रभावित जिलों की हालिया समीक्षा में दंतेवाड़ा को सबसे निचली श्रेणी में रखा गया है। प्रशासन के अनुसार जिले में नक्सली प्रभाव अब घटकर महज 5.7 प्रतिशत रह गया है।

📉 आंकड़ों में सिमटता प्रभाव
पुलिस और प्रशासनिक आंकड़ों के मुताबिक—
- अब तक 1626 नक्सली मुख्यधारा में लौट चुके हैं।
- 259 नक्सली मुठभेड़ों में मारे जा चुके हैं।
- जिले में फिलहाल केवल 8 सक्रिय नक्सली शेष बताए जा रहे हैं।
- इनमें दो डीवीसीएम (डिविजनल कमेटी मेंबर) रैंक के कैडर शामिल हैं।
यह स्थिति दंतेवाड़ा के लिए एक बड़े बदलाव का संकेत मानी जा रही है।
🌲 जो कभी गढ़ थे…
मलांगिर और कटेकल्याण जैसे इलाके, जो कभी नक्सल गतिविधियों के प्रमुख केंद्र माने जाते थे, अब काफी हद तक शांत बताए जा रहे हैं। प्रशासन का दावा है कि जिले में अब किसी भी एरिया कमेटी का सक्रिय कमांडर नहीं बचा है।
🚨 अंतिम चरण का ऑपरेशन
सरकार द्वारा तय समयसीमा में केवल 30 दिन शेष हैं। इसे देखते हुए पुलिस ने अंतिम चरण का सर्च ऑपरेशन तेज कर दिया है। जंगल क्षेत्रों में लगातार अभियान चलाए जा रहे हैं और सुरक्षा बलों की मौजूदगी बढ़ाई गई है।
🤝 आत्मसमर्पण की अपील
प्रशासन लगातार शेष नक्सलियों से आत्मसमर्पण की अपील कर रहा है। पुनर्वास नीति के तहत उन्हें मुख्यधारा में लौटने का अवसर दिया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि जो हथियार छोड़कर समाज में लौटना चाहते हैं, उनके लिए सरकार के दरवाजे खुले हैं।
🔎 निर्णायक मोड़ पर दंतेवाड़ा
लंबे समय तक हिंसा और असुरक्षा का सामना करने वाला दंतेवाड़ा अब एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा नजर आ रहा है। यदि मौजूदा अभियान सफल रहा तो यह जिला पूरी तरह नक्सल मुक्त होने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है।
