रायपुर/बस्तर। उप मुख्यमंत्री और गृह मंत्री विजय शर्मा का यह बयान बेहद बड़ा और राजनीतिक-सुरक्षात्मक, दोनों लिहाज से अहम माना जा रहा है। उन्होंने कहा है कि पापाराव के आत्मसमर्पण के बाद छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद खत्म हो गया और अब प्रदेश में एक भी नक्सली नहीं बचा है। हालांकि, यहां एक जरूरी बात है—अभी जो खबरें सामने हैं, उनमें पापाराव के सरेंडर को लेकर मीडिया रिपोर्ट्स और सूत्रों का जोर ज्यादा है, जबकि औपचारिक स्थिति और बारीक विवरण में कुछ अंतर भी दिख रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया की आज, 24 मार्च 2026, की रिपोर्ट में पापाराव के साथ 21 कैडरों के आत्मसमर्पण की बात कही गई है, जबकि आपकी कॉपी में 17 साथियों का जिक्र है। इसलिए संख्या को लेकर अभी सावधानी जरूरी है।

विजय शर्मा के बयान का मतलब क्या है?
विजय शर्मा का बयान सिर्फ एक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि सरकार की उस बड़ी लाइन का हिस्सा है जिसमें 31 मार्च 2026 तक सशस्त्र नक्सलवाद खत्म करने का लक्ष्य लगातार दोहराया गया है। पिछले हफ्ते भी उन्होंने कहा था कि राज्य फिलहाल 31 मार्च 2026 की डेडलाइन पर फोकस कर रहा है, और उसके बाद अगले चरण में केंद्रीय बलों की वापसी की बात देखी जा सकती है। यानी पापाराव का संभावित आत्मसमर्पण सरकार के लिए सिर्फ एक सरेंडर नहीं, बल्कि “अंतिम चरण” की पुष्टि जैसा नैरेटिव बन रहा है।
पापाराव इतना बड़ा नाम क्यों है?
पापाराव को लंबे समय से बस्तर में सक्रिय आखिरी बड़े माओवादी कमांडरों में गिना जाता रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया की जनवरी 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, बस्तर में सशस्त्र माओवादी ढांचा काफी सिमट चुका था और कुछ बड़े नाम ही बाकी माने जा रहे थे, जिनमें देवजी और पापाराव जैसे नाम चिंता का कारण बताए गए थे। इसी वजह से अगर पापाराव वास्तव में आत्मसमर्पण करता है, तो इसे संगठन के कमांड ढांचे, मनोबल और जमीनी नेटवर्क—तीनों पर बड़ा झटका माना जाएगा।
क्या सचमुच “छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद खत्म” हो गया?
यहीं सबसे जरूरी सावधानी चाहिए। सरकार और मंत्री का बयान राजनीतिक तथा अभियान-केंद्रित दावा है, लेकिन उपलब्ध रिपोर्ट्स यह दिखाती हैं कि हाल के महीनों तक सुरक्षा एजेंसियां खुद कह रही थीं कि आंदोलन अंतिम चरण में है, पूरी तरह शून्य नहीं हुआ है। उदाहरण के तौर पर, चार हफ्ते पहले विजय शर्मा ने कहा था कि नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई “last phase” में पहुंच गई है। इसी तरह जनवरी 2026 की रिपोर्ट में बस्तर में अभी भी 100 से ज्यादा सशस्त्र कैडरों के बचे होने की बात कही गई थी। इसलिए “अब एक भी नक्सली नहीं बचा” को इस समय सरकारी दावा मानना ज्यादा सही होगा, न कि स्वतंत्र रूप से पूर्णतः सत्यापित निष्कर्ष।
सरेंडर की खबर में अभी क्या-क्या सामने आया है?
ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, पापाराव जंगल से बाहर आकर आत्मसमर्पण कर सकता है और उसके साथ कई कैडर भी हथियार डाल सकते हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसे बस्तर के “final Maoist chapter” जैसा मोड़ बताया है। दूसरी ओर, पहले भी Bastar IG Sundarraj P सार्वजनिक रूप से बाकी बचे वरिष्ठ माओवादियों—जिनमें पापाराव का नाम भी शामिल था—से मुख्यधारा में लौटने की अपील कर चुके हैं। इससे साफ है कि सुरक्षा एजेंसियों की निगाह लंबे समय से उस पर थी और उसका सरेंडर प्रतीकात्मक तौर पर बहुत बड़ा माना जा रहा था।
पापाराव का पिछला रिकॉर्ड क्यों चर्चा में है?
उसे बस्तर के हिंसक नक्सली नेटवर्क का बड़ा चेहरा माना गया है। आपकी दी गई जानकारी में उसे वेस्ट बस्तर डिवीजन का सचिव, DKSZC का सदस्य और कई बड़े हमलों का रणनीतिक चेहरा बताया गया है। उपलब्ध मीडिया रिपोर्ट्स भी broadly यही संकेत देती हैं कि वह उन वरिष्ठ चेहरों में था जिनकी मौजूदगी से बस्तर का बचा-खुचा सशस्त्र ढांचा टिके रहने की कोशिश कर रहा था। हालांकि आपके टेक्स्ट में दिए गए हर विशिष्ट ऑपरेशनल आरोप की अलग-अलग आधिकारिक पुष्टि मुझे एक ही सार्वजनिक स्रोत में नहीं मिली, इसलिए उन हिस्सों को सुरक्षा एजेंसियों के दावे/मीडिया नैरेटिव के रूप में रखना ज्यादा जिम्मेदार होगा।
व्यापक तस्वीर क्या कहती है?
पिछले महीनों में एक के बाद एक बड़े घटनाक्रम हुए हैं—वरिष्ठ माओवादी नेताओं की मौत, कई कैडरों के सरेंडर, और नेतृत्व पर दबाव। फरवरी 2026 में 51 माओवादियों के आत्मसमर्पण पर Bastar IG ने कहा था कि पिछले दो वर्षों में 2,400 से ज्यादा कैडर संगठन छोड़ चुके हैं। इससे यह तो साफ है कि बस्तर में माओवादी ढांचा तेजी से कमजोर हुआ है। लेकिन “पूरी तरह खत्म” होने का दावा अभी भी मुख्यतः सरकारी और राजनीतिक भाषा में ज्यादा मजबूत दिखता है, न कि स्वतंत्र सत्यापन में।
