कटघोरा। पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की हनुमंत कथा के पहले ही दिन कोरबा जिले का माहौल पूरी तरह धार्मिक रंग में रंगा नजर आया। ढपढप क्षेत्र में आयोजित इस पांच दिवसीय कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे, जिससे आयोजन स्थल पर भारी भीड़ उमड़ पड़ी। रिपोर्ट्स के मुताबिक यह कथा 28 मार्च से 1 अप्रैल तक चलेगी और इसमें आगे दिव्य दरबार जैसे विशेष कार्यक्रम भी प्रस्तावित हैं।

पहले दिन ही उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब
कथा शुरू होने से पहले ही इलाके में माहौल भक्तिमय हो चुका था। कथा स्थल पर दूर-दूर से लोग पहुंचे, जिसके कारण आयोजन स्थल के साथ-साथ आसपास के मार्गों पर भी भारी भीड़ देखी गई। प्रशासन और आयोजन समिति के लिए भीड़ प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बन गया। स्थानीय स्तर पर यह आयोजन सिर्फ धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि बड़े जनसमूह और सामाजिक प्रभाव वाला आयोजन बनकर उभरा है।
मंच से दिया तीखा बयान, बढ़ सकती है सियासी-समाजिक चर्चा
कथा के दौरान पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने धर्मांतरण के मुद्दे पर कड़ा और विवादित बयान दिया। उन्होंने कथित तौर पर उन लोगों के खिलाफ सख्त शब्दों का इस्तेमाल किया, जिन्हें वे धर्मांतरण से जोड़कर देख रहे थे। उनके इस बयान के बाद यह मुद्दा सिर्फ धार्मिक मंच तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि इसके सामाजिक और राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं।
ऐसे बयान अक्सर जनसमर्थन और विरोध—दोनों को जन्म देते हैं। समर्थक इसे “सनातन रक्षा” के तौर पर देखते हैं, जबकि आलोचक इसे उत्तेजक और विभाजनकारी भाषा मान सकते हैं। इसलिए यह बयान आने वाले दिनों में स्थानीय और राज्य स्तर पर बहस का विषय बन सकता है।
‘घर वापसी’ के एजेंडे पर जोर
अपने संबोधन में शास्त्री ने यह भी संकेत दिया कि वे केवल कथा करने नहीं आए, बल्कि उन लोगों को वापस जोड़ने के मिशन के साथ आए हैं, जो उनके अनुसार “अपनी जड़ों से दूर” चले गए हैं। उन्होंने “घर वापसी” का जिक्र कर यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि उनका फोकस धार्मिक पुनर्संपर्क और सांस्कृतिक पहचान पर है।
यही कारण है कि कोरबा की यह कथा अब सिर्फ आध्यात्मिक आयोजन नहीं, बल्कि धार्मिक-सामाजिक संदेश देने वाला मंच भी बनती दिख रही है।
कोरबा की ऊर्जा शक्ति और औद्योगिक पहचान का भी किया जिक्र
धीरेंद्र शास्त्री ने अपने संबोधन में कोरबा की पहचान को भी प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा कि कोरबा केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि देश के बड़े हिस्से को ऊर्जा देने वाला जिला है। उन्होंने कोरबा के कोयला उत्पादन और बिजली उत्पादन क्षमता का जिक्र करते हुए इसे “देश को रोशन करने वाली धरती” बताया।
इस तरह के स्थानीय संदर्भों ने वहां मौजूद लोगों से उनका जुड़ाव और मजबूत किया। धार्मिक मंच पर स्थानीय गौरव का जिक्र होने से श्रोताओं में उत्साह और अपनापन दोनों दिखाई दिया।
“मैं छत्तीसगढ़ का भांचा हूँ” कहकर जोड़ा भावनात्मक रिश्ता
अपने संबोधन के दौरान शास्त्री ने खुद को “छत्तीसगढ़ का भांचा” बताते हुए जनता से भावनात्मक रिश्ता जोड़ने की कोशिश की। उन्होंने माता कौशल्या की धरती का उल्लेख करते हुए कहा कि इस भूमि से उनका विशेष नाता है।
छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान में “भांचा” शब्द सिर्फ रिश्तेदारी नहीं, बल्कि अपनापन, स्नेह और सामाजिक निकटता का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में उनके इस बयान ने मौजूद श्रद्धालुओं के बीच भावनात्मक प्रभाव पैदा किया।
1 अप्रैल तक चलेगा आयोजन, दिव्य दरबार पर भी नजर
यह पांच दिवसीय हनुमंत कथा 1 अप्रैल तक जारी रहेगी। कथा के दौरान आगे भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। आयोजन में दिव्य दरबार जैसे कार्यक्रमों को लेकर भी लोगों में खास उत्साह बना हुआ है।
आयोजकों के मुताबिक आने वाले दिनों में भी भीड़ बढ़ सकती है, इसलिए प्रशासन को सुरक्षा, ट्रैफिक और व्यवस्था पर विशेष ध्यान देना पड़ सकता है। पहले दिन की भीड़ ने ही यह संकेत दे दिया है कि कार्यक्रम का प्रभाव कोरबा और आसपास के जिलों तक फैला हुआ है।
क्यों अहम है यह आयोजन?
कोरबा में हो रही यह कथा कई वजहों से महत्वपूर्ण बन गई है।
- धार्मिक रूप से यह बड़ा आयोजन है
- सामाजिक रूप से यह जनसमूह को प्रभावित कर रहा है
- राजनीतिक रूप से इसके बयान चर्चा पैदा कर सकते हैं
- और सांस्कृतिक रूप से यह “सनातन” बनाम “धर्मांतरण” जैसी बहस को फिर तेज कर सकता है
कुल मिलाकर, कोरबा की यह हनुमंत कथा सिर्फ आस्था का मंच नहीं रह गई है, बल्कि यह धर्म, समाज, पहचान और राजनीति के कई पहलुओं को एक साथ सामने ला रही है। आने वाले दिनों में यह आयोजन और इससे जुड़े बयान प्रदेश की चर्चा का बड़ा विषय बने रह सकते हैं।
