रायपुर। छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के मुद्दे पर अब सियासी घमासान तेज हो गया है। एक ओर केंद्र और राज्य सरकार नक्सलवाद के लगभग समाप्त होने को बड़ी उपलब्धि बताकर अपनी रणनीति और सुरक्षा बलों की कार्रवाई को श्रेय दे रही है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस इस दावे और भाजपा के आरोपों को लेकर आक्रामक रुख में दिखाई दे रही है। इसी कड़ी में पूर्व मुख्यमंत्री Bhupesh Baghel ने केंद्रीय गृहमंत्री Amit Shah को नक्सलवाद के मुद्दे पर खुली बहस की चुनौती दे दी है। उधर मुख्यमंत्री Vishnu Deo Sai ने कांग्रेस पर पलटवार करते हुए कहा कि नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में पूर्ववर्ती सरकार ने केंद्र का अपेक्षित सहयोग नहीं किया। आज की राजनीतिक बयानबाजी उस बड़े राष्ट्रीय दावे के बीच हो रही है, जिसमें अमित शाह ने मार्च 2026 तक देश को नक्सलवाद से मुक्त करने का लक्ष्य बार-बार दोहराया था और संसद में भी इस पर जोर दिया था।

भूपेश बघेल का हमला: “कांग्रेस सरकार ने पूरा सहयोग दिया”
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भाजपा पर नक्सलवाद जैसे गंभीर विषय पर “राजनीतिक झूठ” फैलाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में नक्सल समस्या से निपटने के लिए केंद्र सरकार को हर संभव सहयोग दिया गया था। बघेल के अनुसार, राज्य सरकार ने केवल सुरक्षा दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि विकास आधारित रणनीति के जरिए भी प्रभावित इलाकों में काम किया। उनका दावा है कि उनकी सरकार ने जोखिम वाले इलाकों में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और जनसुविधाओं से जुड़े कई काम किए, ताकि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शासन की पहुंच मजबूत हो सके। बघेल ने अमित शाह के उस कथन को असत्य बताया, जिसमें संसद के भीतर यह संकेत दिया गया कि कांग्रेस सरकार ने नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में सहयोग नहीं किया। इसी मुद्दे पर उन्होंने गृहमंत्री को खुली बहस की चुनौती देते हुए कहा कि मंच तय कर लिया जाए, वे तथ्यों के साथ चर्चा को तैयार हैं।
CM साय का पलटवार: “अपनी कमजोरी छुपाने के लिए झूठ बोल रहे हैं”
भूपेश बघेल के बयान पर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि भूपेश बघेल जो आरोप लगा रहे हैं, वे “सरासर असत्य” हैं। CM साय का कहना है कि दिसंबर 2023 में नई सरकार बनने के बाद जब नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की समीक्षा की गई, तब यह सामने आया कि देश में सक्रिय नक्सलवाद का बड़ा हिस्सा छत्तीसगढ़ में सिमटा हुआ था। उनके मुताबिक, अगर पिछली कांग्रेस सरकार ने अपने पांच साल के कार्यकाल में नक्सलवाद के खिलाफ दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति और स्पष्ट रणनीति के साथ लड़ाई लड़ी होती, तो हालात इतने लंबे समय तक गंभीर नहीं रहते। साय ने यह भी आरोप लगाया कि केंद्र सरकार की नीति और सुरक्षा रणनीति को राज्य स्तर पर वैसा सहयोग नहीं मिला, जैसा मिलना चाहिए था। इसलिए अब यदि कांग्रेस खुद को इस लड़ाई का मुख्य भागीदार बता रही है, तो यह “सच्चाई से परे” है।
“31 मार्च प्रदेश के लिए ऐतिहासिक दिन”: CM साय
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने 31 मार्च को छत्तीसगढ़ के लिए “ऐतिहासिक दिन” बताते हुए कहा कि यह उपलब्धि सुरक्षा बलों, राज्य पुलिस, केंद्रीय एजेंसियों और सरकार की संयुक्त रणनीति का परिणाम है। उन्होंने जवानों के साहस, बलिदान और लगातार अभियान को इस सफलता का सबसे बड़ा आधार बताया। साय ने प्रधानमंत्री Narendra Modi और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का विशेष रूप से आभार जताया और कहा कि नक्सलवाद छत्तीसगढ़ के विकास में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक था। उनका कहना है कि अमित शाह ने 2024 में जो संकल्प लिया था, वह अब पूरा होता दिख रहा है और इसका सबसे बड़ा लाभ बस्तर संभाग को मिलेगा। साय के मुताबिक अब बस्तर में विकास कार्य और तेज़ी से होंगे, निवेश आएगा, बुनियादी सुविधाएं बढ़ेंगी और लोगों को लंबे समय बाद शांति व अवसर का माहौल मिलेगा। अमित शाह ने पहले भी सार्वजनिक मंचों और सुरक्षा समीक्षा बैठकों में मार्च 2026 तक नक्सलवाद खत्म करने का लक्ष्य रखा था।
नक्सलवाद खत्म होने का राजनीतिक मतलब क्या है?
छत्तीसगढ़ की राजनीति में नक्सलवाद केवल सुरक्षा का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह हमेशा शासन, विकास, आदिवासी क्षेत्रों की भागीदारी, संसाधनों के उपयोग और राज्य की राजनीतिक विश्वसनीयता से जुड़ा रहा है। यही वजह है कि जैसे ही “नक्सलवाद खत्म” होने का दावा सामने आया, इसका श्रेय लेने की राजनीतिक होड़ भी तेज हो गई। भाजपा इसे अपनी “जीरो टॉलरेंस नीति”, केंद्र-राज्य समन्वय और सुरक्षा अभियानों की सफलता के रूप में पेश कर रही है। वहीं कांग्रेस यह संदेश देना चाहती है कि नक्सलवाद के खिलाफ संघर्ष में उसकी सरकार ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और भाजपा पूरे इतिहास को अपने पक्ष में लिखने की कोशिश कर रही है। यही टकराव अब बयानबाजी से आगे बढ़कर प्रत्यक्ष राजनीतिक चुनौती का रूप लेता दिख रहा है।
झीरम घाटी कांड पर भी छिड़ा विवाद
मुख्यमंत्री साय ने इस बहस के बीच कांग्रेस पर झीरम घाटी कांड को लेकर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि जब डॉ. रमन सिंह की सरकार थी, तब विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस के नेताओं की ओर से यह कहा जाता था कि झीरम घाटी हमले से जुड़े “सबूत जेब में हैं”। लेकिन जब कांग्रेस सत्ता में आई, तब न तो वह इस मामले में निर्णायक जांच करा सकी और न ही वह कथित “सबूत” सामने आ पाए। CM साय ने इसी आधार पर कांग्रेस की नीयत और विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। उनका संकेत यह था कि कांग्रेस ने नक्सलवाद और उससे जुड़े बड़े मामलों पर राजनीतिक बयान तो बहुत दिए, लेकिन सत्ता में आने के बाद ठोस नतीजे नहीं दे सकी।
राहुल गांधी और नक्सल मुद्दे को लेकर भी भाजपा का हमला
मुख्यमंत्री साय ने कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व पर भी हमला बोला। उन्होंने राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि यात्रा के दौरान कई स्थानों पर ऐसे लोग दिखे, जिनके संबंधों को लेकर सवाल उठे। साय ने यह भी कहा कि जब कुख्यात नक्सली हिडमा जैसे नामों के खिलाफ कार्रवाई हुई, तब कुछ नारों और प्रतिक्रियाओं ने गंभीर सवाल खड़े किए। भाजपा इस पूरे नैरेटिव के जरिए कांग्रेस को “नक्सलवाद पर नरम” दिखाने की कोशिश कर रही है। हालांकि कांग्रेस की ओर से इस तरह के आरोपों को अक्सर राजनीतिक और तथ्यहीन करार दिया जाता रहा है। इस तरह अब नक्सलवाद का मुद्दा केवल सुरक्षा और विकास तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि यह भाजपा बनाम कांग्रेस की सीधी राजनीतिक लड़ाई का बड़ा हथियार बनता जा रहा है।
अब बस्तर पर रहेगा सबकी नजर
अगर राज्य और केंद्र सरकार का यह दावा जमीनी तौर पर सही साबित होता है कि नक्सलवाद निर्णायक रूप से कमजोर या समाप्त हो चुका है, तो सबसे बड़ा सवाल अब यह होगा कि बस्तर और अन्य प्रभावित इलाकों में आगे क्या बदलाव दिखाई देंगे। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, मोबाइल नेटवर्क, बैंकिंग, पर्यटन, उद्योग, वनाधिकार, स्थानीय रोजगार और आदिवासी समुदायों की भागीदारी—इन सभी मुद्दों पर अब सरकारों की असली परीक्षा होगी। क्योंकि सुरक्षा सफलता के बाद जनता की अपेक्षा सीधे विकास, विश्वास और न्यायपूर्ण भागीदारी पर टिकेगी। इसी कारण आने वाले समय में बस्तर केवल सुरक्षा विमर्श का नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रदर्शन और विकास मॉडल की परीक्षा का सबसे बड़ा केंद्र बन सकता है।
छोटा निष्कर्ष
साफ है कि नक्सलवाद के खात्मे का दावा अब सिर्फ सुरक्षा उपलब्धि नहीं, बल्कि बड़ा राजनीतिक नैरेटिव बन चुका है। भाजपा इसे अपनी निर्णायक सफलता बताकर राजनीतिक पूंजी में बदलना चाहती है, जबकि कांग्रेस इस पूरे विमर्श में अपना योगदान सामने रखकर भाजपा के दावों को चुनौती दे रही है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा छत्तीसगढ़ की राजनीति में और गर्माने के पूरे आसार हैं।
