छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद खत्म होने के दावे के बीच अब नया राजनीतिक सवाल यह उठ रहा है कि अगर हालात सामान्य हो रहे हैं, तो बस्तर से सुरक्षाबल कब लौटेंगे?
इसी मुद्दे पर पूर्व मुख्यमंत्री Bhupesh Baghel लगातार सवाल उठा रहे हैं, और अब इस पर उप मुख्यमंत्री Arun Sao ने तीखा जवाब दिया है।
अरुण साव ने साफ कहा कि “जब समय आएगा, तब सुरक्षा जवान भी लौटाए जाएंगे”, लेकिन साथ ही उन्होंने भूपेश बघेल पर यह आरोप भी लगाया कि उनकी सरकार कभी नहीं चाहती थी कि छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद पूरी तरह खत्म हो। यह राजनीतिक टकराव फिलहाल बयानबाज़ी तक है, लेकिन इसके पीछे बस्तर की सुरक्षा रणनीति और राजनीतिक नैरेटिव दोनों काम कर रहे हैं।
आखिर भूपेश बघेल क्या सवाल उठा रहे हैं?
पूर्व मुख्यमंत्री का मूल सवाल यह है कि अगर सरकार और भाजपा नेता बार-बार कह रहे हैं कि नक्सलवाद लगभग समाप्ति की ओर है या बड़ा नियंत्रण हासिल हो चुका है, तो फिर:
- बस्तर में इतनी बड़ी सुरक्षा तैनाती क्यों बनी हुई है?
- सुरक्षाबलों की वापसी की कोई समयसीमा क्यों नहीं बताई जा रही?
- क्या “नक्सलवाद खत्म” का दावा सिर्फ राजनीतिक बयान है?
यानी भूपेश बघेल इस मुद्दे पर सरकार के दावे और ज़मीनी व्यवस्था के बीच अंतर दिखाने की कोशिश कर रहे हैं।
अरुण साव ने पलटवार में क्या कहा?
अरुण साव ने इस सवाल को सिर्फ प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि राजनीतिक मंशा से जोड़कर जवाब दिया।
उन्होंने कहा कि:
- भूपेश बघेल कभी नहीं चाहते थे कि नक्सलवाद खत्म हो
- उनकी सरकार में पुलिस और जवानों के हाथ बांध दिए गए थे
- जब उनकी सरकार बनी थी, तब नक्सलियों ने खुशी मनाई थी
- उन्हें प्रदेश के विकास और खुशहाली से कोई लेना-देना नहीं है
यह बयान सीधे-सीधे कांग्रेस शासनकाल की सुरक्षा नीति पर हमला है।
भाजपा इस नैरेटिव को मजबूत करना चाहती है कि उसकी सरकार ने सख्त नीति अपनाई, जबकि पिछली सरकार ढीली या राजनीतिक रूप से नरम थी।
“जब समय आएगा, जवान भी लौटेंगे” — इस बयान का असली मतलब क्या है?
यह इस पूरे विवाद का सबसे अहम हिस्सा है।
अरुण साव ने सुरक्षाबलों की वापसी को ना तो नकारा, और ना ही तत्काल स्वीकार किया।
उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि “जब समय आएगा” तब वापसी होगी।
इसका राजनीतिक और प्रशासनिक मतलब:
सरकार यह संदेश देना चाहती है कि:
- सुरक्षा बलों की मौजूदगी अभी भी जरूरी है
- सरकार “जल्दबाज़ी” में फोर्स नहीं हटाएगी
- सिर्फ कुछ सफल ऑपरेशन या सरेंडर के आधार पर सुरक्षा ढांचा नहीं बदला जाएगा
- स्थायी शांति और प्रशासनिक पकड़ बनने के बाद ही वापसी संभव होगी
यानी सरकार का रुख फिलहाल “पहले पूरी स्थिरता, फिर वापसी” वाला दिख रहा है।
क्या वाकई बस्तर में हालात तेजी से बदले हैं?
सरकार का दावा है कि पिछले कुछ समय में नक्सलवाद पर निर्णायक बढ़त मिली है।
हाल के महीनों में बड़े पैमाने पर सरेंडर, सुरक्षा अभियानों की तीव्रता और पुनर्वास योजनाओं को सरकार अपनी सफलता के रूप में पेश कर रही है।
ताज़ा रिपोर्टों के मुताबिक, मार्च 2026 तक 1,200 से अधिक पूर्व माओवादी कैडर स्किल ट्रेनिंग पूरी कर चुके हैं, 520 और प्रशिक्षण में हैं, और करीब 3,000 सरेंडर का उल्लेख किया गया है। इसे सरकार रीहैब + ऑपरेशन मॉडल की सफलता बता रही है।
यानी सरकार यह कहना चाहती है कि:
- सिर्फ बंदूक से नहीं,
- बल्कि सरेंडर, ट्रेनिंग, रोजगार और पुनर्वास से भी
नक्सलवाद को कमजोर किया गया है।
16,000 नक्सल प्रभावितों के पुनर्वास की बात क्यों अहम है?
अरुण साव ने बयान में सिर्फ सुरक्षा नहीं, बल्कि पुनर्वास मॉडल को भी प्रमुखता दी।
उन्होंने कहा कि सरकार ने पहले से तैयारी की थी कि:
- जो नक्सली सरेंडर करेंगे, उन्हें अच्छा पुनर्वास दिया जाए
- आम लोगों तक सरकारी योजनाएं और सुविधाएं पहुंचाई जाएं
यानी सरकार की रणनीति दो हिस्सों में बंटी दिख रही है:
1) सुरक्षा दबाव
ऑपरेशन, कैंप, गश्त, इंटेलिजेंस, सरेंडर
2) सामाजिक-आर्थिक हस्तक्षेप
रोजगार, ट्रेनिंग, पुनर्वास, सरकारी योजनाएं
राज्य में पुनर्वास मॉडल के तहत स्किल डेवलपमेंट, मजदूरी/रोजगार, आजीविका आधारित क्लस्टर और निजी क्षेत्र से जुड़ाव जैसे कदम भी रिपोर्ट हुए हैं।
भाजपा इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से कैसे पेश कर रही है?
भाजपा का पूरा नैरेटिव यह है कि:
“कांग्रेस शासन में नक्सलवाद पर इच्छाशक्ति की कमी थी,
और भाजपा शासन में निर्णायक कार्रवाई हुई।”
इसीलिए अरुण साव ने भूपेश बघेल पर हमला करते हुए कहा कि उनकी सरकार में:
- पुलिस निष्क्रिय रही
- जवानों को खुलकर काम नहीं करने दिया गया
- नक्सलियों के खिलाफ कड़ा माहौल नहीं बनाया गया
यह बयान सिर्फ जवाब नहीं, बल्कि 2026 की राजनीतिक लाइन भी तय करता है—
कि भाजपा “सुरक्षा और विकास” बनाम कांग्रेस “ढिलाई और भ्रम” का फ्रेम बनाना चाहती है।
लेकिन विपक्ष का सवाल भी पूरी तरह हल्का नहीं है
यहां विपक्ष का सवाल भी पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
अगर सरकार लगातार यह कह रही है कि:
- नक्सलवाद कमजोर हो चुका है
- हजारों लोग मुख्यधारा में लौट रहे हैं
- बड़े इलाके अब सुरक्षित हैं
तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठेगा कि:
“फिर सुरक्षा बलों की मौजूदगी कब तक?”
यानी यह सिर्फ राजनीतिक हमला नहीं, बल्कि नीति की पारदर्शिता का भी सवाल है।
हालांकि सुरक्षा मामलों में सरकारें अक्सर समयसीमा सार्वजनिक नहीं करतीं, क्योंकि:
- इससे ऑपरेशनल रणनीति प्रभावित हो सकती है
- गलत संदेश जा सकता है
- फोर्स हटाने का संकेत नक्सल नेटवर्क को मनोवैज्ञानिक लाभ दे सकता है
इसलिए सरकार का “अभी नहीं, बाद में” वाला जवाब रणनीतिक रूप से सुरक्षित माना जा सकता है।
अरुण साव ने पश्चिम बंगाल वाले मुद्दे पर क्या कहा?
बयान के दौरान अरुण साव ने पश्चिम बंगाल की स्थिति पर भी हमला बोला।
उन्होंने वहां SIR (Special Intensive Revision) प्रक्रिया से जुड़े न्यायिक अधिकारियों को घेरकर/बंधक बनाए जाने की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि:
- पश्चिम बंगाल में कानून का राज नहीं है
- राज्य संविधान से नहीं, ममता बनर्जी की तानाशाही से चल रहा है
- जनता चुनाव में ऐसी सरकार को हटा देगी
हाल में मालदा में SIR ड्यूटी पर गए 7 न्यायिक अधिकारियों को घंटों घेरने/बंधक जैसी स्थिति में रखने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराज़गी जताई, राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों से जवाब मांगा और सुरक्षा के लिए केंद्रीय बलों/स्वतंत्र जांच जैसे निर्देशों पर जोर दिया।
यानी अरुण साव ने छत्तीसगढ़ के बयान में राष्ट्रीय राजनीतिक हमला भी जोड़ दिया।
पेट्रोल महंगा होने पर अरुण साव ने क्या कहा?
वैट में छूट खत्म होने के बाद पेट्रोल के दाम बढ़ने को लेकर सवाल हुआ तो अरुण साव ने इसे सीधे राहत या रोलबैक के रूप में नहीं लिया।
उन्होंने कहा कि:
- आम जनता सरकार के साथ खड़ी है
- यह एक चुनौतीपूर्ण समय है
- वैश्विक स्थिति सुधरने पर हालात बेहतर होंगे
यह जवाब बताता है कि सरकार फिलहाल इस मुद्दे पर राजनीतिक बचाव की लाइन ले रही है, न कि तत्काल राहत की घोषणा वाली।
यानी सरकार कीमतों को वैश्विक/बाहरी कारणों से जोड़कर पेश कर रही है।
मनीष कुंजाम के आरोप पर सरकार का जवाब क्या है?
पूर्व विधायक और Manish Kunjam से जुड़े आरोपों के संदर्भ में भी अरुण साव ने प्रतिक्रिया दी।
मनीष कुंजाम ने कथित तौर पर आरोप लगाया था कि किसी “बड़ी डील” के तहत नक्सली कमांडर ने समर्पण किया।
इस पर अरुण साव ने कहा कि:
- यह आरोप बेबुनियाद और निराधार है
- नक्सलियों ने स्वेच्छा से सरेंडर किया है
- वे सरकार की सरेंडर पॉलिसी से प्रभावित होकर मुख्यधारा में लौटे हैं
यानी सरकार यह नैरेटिव बनाना चाहती है कि सरेंडर किसी सौदे का परिणाम नहीं, बल्कि दबाव + नीति + पुनर्वास का असर है।
इस पूरे बयान का राजनीतिक सार क्या है?
अगर पूरे बयान को एक लाइन में समझें, तो अरुण साव ने एक साथ चार मोर्चों पर जवाब दिया:
1) भूपेश बघेल पर हमला
“आपकी सरकार नक्सलवाद खत्म नहीं करना चाहती थी”
2) अपनी सरकार का बचाव
“हमने अभियान, सरेंडर और पुनर्वास की पूरी तैयारी की”
3) राष्ट्रीय राजनीति पर हमला
“पश्चिम बंगाल में कानून का राज नहीं है”
4) आर्थिक सवाल पर बचाव
“पेट्रोल महंगा है, लेकिन जनता साथ है और हालात सुधरेंगे”
यानी यह सिर्फ एक रिएक्शन नहीं, बल्कि पूरी राजनीतिक पोजिशनिंग है।
खबर का आसान निष्कर्ष
सीधी भाषा में समझें:
- Bhupesh Baghel बस्तर से सुरक्षाबल हटाने/वापसी को लेकर सवाल उठा रहे हैं
- इस पर Arun Sao ने पलटवार करते हुए कहा कि “समय आने पर जवान लौटेंगे”
- अरुण साव ने कांग्रेस सरकार पर आरोप लगाया कि उसने पुलिस और जवानों के हाथ बांध दिए थे
- सरकार ने नक्सल सरेंडर और पुनर्वास को अपनी बड़ी उपलब्धि बताया
- पश्चिम बंगाल के SIR विवाद पर भी उन्होंने ममता सरकार पर हमला बोला
- पेट्रोल कीमत और नक्सली सरेंडर पर उठे सवालों का भी राजनीतिक जवाब दिया गया

