छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग और उपयोगी शौचालयों की कमी पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने इसे “शर्मनाक” स्थिति कहा है और साफ संकेत दिया है कि सरकारी दावों और जमीनी हकीकत में बड़ा फर्क है।
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि पहले भी इस मुद्दे पर निर्देश दिए जा चुके थे, लेकिन हालात में अपेक्षित सुधार नहीं दिख रहा। इसलिए कोर्ट ने अब स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव से शपथ पत्र (Affidavit) के साथ विस्तृत जवाब मांगा है। यानी अब विभाग को सिर्फ मौखिक सफाई नहीं, बल्कि लिखित और कानूनी जिम्मेदारी के साथ तथ्य रखने होंगे।

मामला किस तरह कोर्ट तक पहुंचा?
यह मामला जनहित याचिका (PIL) के जरिए कोर्ट के सामने आया।
जनवरी 2025 में दायर इस याचिका की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने एक समाचार रिपोर्ट का भी हवाला दिया, जिसमें सरकारी स्कूलों में लड़कियों के शौचालयों की गंभीर कमी और खराब हालत का जिक्र था।
सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने की। कोर्ट ने साफ कहा कि यह सिर्फ “बुनियादी सुविधा” का मुद्दा नहीं, बल्कि शिक्षा के अधिकार और गरिमा (dignity) का सवाल है।
आंकड़े क्या कहते हैं?
यही इस खबर का सबसे चिंताजनक हिस्सा है।
आपके दिए गए इनपुट के अनुसार:
- 5,000 से अधिक स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं हैं
- 8,000 से अधिक स्कूलों में शौचालयों की स्थिति बेहद खराब है
- बिलासपुर जिले में ही:
- 160+ स्कूलों में शौचालय से जुड़ी गंभीर समस्याएं हैं
- 200+ स्कूलों में शौचालय अनुपयोगी हैं
इसके अलावा, केंद्र सरकार के UDISE+ 2024-25 के आधिकारिक डेटा में भी यह साफ दिखता है कि छत्तीसगढ़ में लड़कियों के लिए शौचालय की उपलब्धता और उसकी कार्यशीलता में बड़ा अंतर है। सरकारी शिक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में कुल 55,889 लड़कियों/को-एजुकेशनल स्कूलों में से सिर्फ 50,316 स्कूलों में कार्यशील (functional) girls’ toilet हैं। यानी करीब 5,500 से अधिक स्कूल ऐसे हैं जहां या तो लड़कियों के लिए शौचालय नहीं है या फिर वह काम करने की स्थिति में नहीं है।
महत्वपूर्ण बात:
अक्सर सरकारी रिकॉर्ड में “toilet available” और “functional toilet” अलग चीजें होती हैं।
यानी कागज पर टॉयलेट बना हुआ दिख सकता है, लेकिन उसमें:
- पानी नहीं,
- दरवाजा टूटा,
- सफाई नहीं,
- सीट/टंकी खराब,
- उपयोग लायक व्यवस्था नहीं
तो वह छात्राओं के लिए practically बेकार है।
कोर्ट ने इसे इतना गंभीर क्यों माना?
क्योंकि यह समस्या सीधे लड़कियों की पढ़ाई और स्वास्थ्य पर असर डालती है।
1) छात्राओं की गरिमा और सुरक्षा का सवाल
स्कूल में अलग और सुरक्षित टॉयलेट न होना, खासकर किशोरावस्था की लड़कियों के लिए, बहुत बड़ी समस्या है। इससे:
- असहजता बढ़ती है
- स्कूल में पूरे समय रुकना मुश्किल होता है
- मासिक धर्म (periods) के दौरान परेशानी बढ़ती है
- कई छात्राएं स्कूल आना कम कर देती हैं
2) स्वास्थ्य पर सीधा असर
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि ऐसी स्थिति से:
- मूत्र संक्रमण (UTI) का खतरा बढ़ता है
- लंबे समय तक पेशाब रोकना पड़ता है
- अस्वच्छ टॉयलेट के कारण संक्रमण फैल सकता है
यह केवल छात्राओं तक सीमित नहीं, महिला शिक्षकों पर भी असर डालता है।
3) ड्रॉपआउट बढ़ने का खतरा
कोर्ट की सबसे अहम चिंता यही रही कि लड़कियों के लिए अलग और काम करने वाला टॉयलेट न होना, स्कूल छोड़ने (dropout) की वजह बन सकता है।
यह खासकर इन वर्गों में ज्यादा असर डालता है:
- ग्रामीण क्षेत्र की छात्राएं
- आर्थिक रूप से कमजोर परिवार
- किशोरावस्था की बच्चियां
- दूर-दराज़ के स्कूलों में पढ़ने वाली छात्राएं
कोर्ट ने इसे “systemic failure” यानी पूरी व्यवस्था की विफलता की तरह देखा है।
“सिर्फ टॉयलेट नहीं” — असल समस्या क्या है?
यह मुद्दा तीन स्तरों पर है:
(A) इंफ्रास्ट्रक्चर गैप
कई स्कूलों में शौचालय बना ही नहीं है या पर्याप्त नहीं है।
(B) मेंटेनेंस फेलियर
जहां बना है, वहां भी अक्सर:
- पानी की सप्लाई नहीं
- नियमित सफाई नहीं
- मरम्मत नहीं
- हैंडवॉश/साबुन की व्यवस्था नहीं
(C) मॉनिटरिंग की कमी
सबसे बड़ी समस्या यह है कि:
- निरीक्षण कागजों में हो जाता है
- फोटो/रिपोर्ट बन जाती है
- जमीनी सुधार नहीं होता
यही वजह है कि कोर्ट ने अब सीधे शिक्षा विभाग के सचिव को जवाबदेह बनाया है।
हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिया है?
कोर्ट ने शिक्षा विभाग से कहा है कि वह:
- विस्तृत रिपोर्ट पेश करे
- शपथ पत्र (Affidavit) के साथ तथ्य दे
- बताए कि:
- कितने स्कूलों में अलग टॉयलेट नहीं हैं
- कितने स्कूलों में टॉयलेट हैं लेकिन काम नहीं कर रहे
- सुधार के लिए अब तक क्या किया गया
- आगे कब तक समस्या दूर होगी
यानी अब विभाग को सिर्फ यह नहीं बताना होगा कि “काम चल रहा है”, बल्कि डेटा + टाइमलाइन + एक्शन प्लान देना होगा।
अगली सुनवाई कब?
आपके दिए गए टेक्स्ट में 23 मार्च 2026 की अगली सुनवाई का जिक्र है।
हालांकि यहां एक बात ध्यान देने लायक है — अगर यह खबर अभी की रिपोर्टिंग के रूप में लिखी गई है, तो तारीख में टाइपो/पुरानी डेट भी हो सकती है, क्योंकि 23 मार्च 2026 एक बीती हुई तारीख है। इसलिए न्यूज़रूम कॉपी में अगली सुनवाई की तारीख एक बार फिर क्रॉस-चेक कर लेना बेहतर होगा।
इस खबर का बड़ा सामाजिक मतलब क्या है?
यह खबर इसलिए बड़ी है क्योंकि यह दिखाती है कि:
“बेटी पढ़ाओ” सिर्फ नारे से नहीं चलेगा
अगर स्कूल में लड़कियों के लिए:
- अलग टॉयलेट,
- पानी,
- साफ-सफाई,
- बेसिक हाइजीन
नहीं होगी, तो शिक्षा की बराबरी सिर्फ कागजों में रह जाएगी।
शिक्षा की गुणवत्ता सिर्फ किताबों से नहीं तय होती
अच्छा स्कूल सिर्फ टीचर और सिलेबस से नहीं बनता।
शौचालय, पानी, बिजली, सुरक्षा, बैठने की व्यवस्था — ये सब शिक्षा का हिस्सा हैं।
यह मुद्दा महिला सशक्तिकरण से भी जुड़ा है
स्कूलों में लड़कियों के लिए गरिमापूर्ण सुविधा न होना, सीधे तौर पर gender inequality को बढ़ाता है।
सरकार के लिए अब सबसे जरूरी क्या है?
अगर इस समस्या का सच में समाधान करना है, तो सिर्फ “घोषणा” नहीं, चार स्तर पर काम जरूरी है:
1) राज्यव्यापी ऑडिट
हर जिले में यह पता किया जाए कि:
- कहां टॉयलेट नहीं हैं
- कहां बने हैं लेकिन खराब हैं
- कहां पानी नहीं है
2) टाइम-बाउंड रिपेयर प्लान
सिर्फ निर्माण नहीं, बल्कि:
- मरम्मत
- पानी कनेक्शन
- सफाई
- उपयोग लायक स्थिति
को समय सीमा में पूरा किया जाए।
3) स्कूल-स्तरीय जिम्मेदारी
हेडमास्टर, BEO, DEO स्तर पर जवाबदेही तय हो।
4) थर्ड पार्टी वेरिफिकेशन
कई बार फाइलों में “पूर्ण” दिखा दिया जाता है। इसलिए स्वतंत्र सत्यापन जरूरी है।
एक लाइन में इस खबर का सार
छत्तीसगढ़ के हजारों सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग/कार्यशील टॉयलेट की कमी पर हाईकोर्ट बेहद सख्त हुआ है और शिक्षा विभाग से शपथ पत्र के साथ जवाब मांगकर यह साफ कर दिया है कि छात्राओं की गरिमा, स्वास्थ्य और पढ़ाई से समझौता बर्दाश्त नहीं होगा।
