यह पिछले तीन महीने में सबसे तेज एक-दिन की गिरावट है। इसका कारण वैश्विक जोखिम का बढ़ना और घरेलू आर्थिक माहौल में अनिश्चितता बताया जा रहा है।
- अमेरिकी डॉलर की मजबूती / जोखिम-भारी माहौल
• इंटरनेशनल रूप से डॉलर इंडेक्स (DXY) मजबूत हुआ है — इस वजह से अन्य उभरती मुद्राओं पर दबाव पड़ा है।
• निवेशक “रिस्क ऑफ” मोड में चले गए हैं, जिससे उभरते बाजारों से पैसा निकलने का प्रवाह बढ़ा है। - निर्यात-और-व्यापार घाटा / अमेरिकी-भारत व्यापार सौदा में देरी
• भारत के निर्यात पर अमेरिकी जुर्माने/शुल्क (tariffs) के कारण दबाव बढ़ा है, जो रुपये पर दबाव डालता है।
• भारत-अमेरिका के बीच संभावित व्यापार सौदे (trade deal) में देरी रही है, जिससे निर्यात-आश्रित गतिविधियों में अनिश्चितता बढ़ी है।
• आयात बढ़ा है (विशेष रूप से सोना, ऊर्जा आदि) और साथ-ही साथ निर्यात अपेक्षाकृत धीमा रहा है — इसने व्यापार घाटा चौड़ा किया है। - निवेशकों द्वारा पूंजी बहिर्वाह (Capital-outflows)
• विदेशी निवेशक भारत-मुद्रा तथा इक्विटी बाजार से बाहर निकल रहे हैं, जिससे रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है।
• जब निवेशक निकलने लगते हैं, विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ जाती है (डॉलर की) और रुपये की आपूर्ति बढ़ने का असर होता है। - Reserve Bank of India (RBI) हस्तक्षेप की कमी / ‘मैनेज्ड फ्लोट’ माहौल
• कुछ विश्लेषकों के अनुसार, RBI ने पिछले बराबर के मुकाबले इस स्तर पर रुपये को अधिक सक्रिय रूप से समर्थन नहीं किया, जिससे गिरावट और तेज
• RBI ने कहा है कि वह किसी “विशिष्ट” मूल्य पर रोक नहीं लगा रहा है, अर्थात् मुद्रा का स्तर अपने आप तय होने दे रहा है।

संक्षिप्त प्रभाव व आगे की चुनौतियाँ
- रुपये की गिरावट से आयात महंगा होगा — खासकर कच्चा तेल, सोना, मेटल्स आदि — जिससे घरेलू मुद्रास्फीति बढ़ सकती है।
- व्यापार घाटा (trade deficit) और चालू खाता घाटा (current account deficit) का जोखिम बढ़ता है, जो मुद्रा पर और दबाव डाल सकता है।
- उभरती मुद्राओं की प्रतियोगिता में रुपये पीछे रहा है, इस साल अब तक अन्य एशियाई मुद्राओं की तुलना में यह सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली प्रमुख मुद्रा बन गया है।
