दिल्ली के जंतर-मंतर पर लंबे समय से धरना और अनशन कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए उन्हें सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस मामले पर दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान वांगचुक को निजी अस्पताल मेदांता में स्थानांतरित करने की मांग उठी। इस पर केंद्र सरकार ने अदालत में कहा कि भारत के राष्ट्रपति सहित कई संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों का इलाज भी सरकारी अस्पतालों में होता है, इसलिए सफदरजंग अस्पताल में इलाज पर सवाल उठाना उचित नहीं है।

मामला क्या है?
सोनम वांगचुक पिछले कई दिनों से अपनी मांगों को लेकर जंतर-मंतर पर धरना और अनशन कर रहे थे। लगातार उपवास के कारण उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। डॉक्टरों ने स्वास्थ्य संबंधी गंभीर जोखिम को देखते हुए उन्हें सफदरजंग अस्पताल में भर्ती करने की सलाह दी, जिसके बाद प्रशासन ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया।
हाई कोर्ट में क्या हुआ?
सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट ने सरकार से पूछा कि आखिर ऐसी क्या परिस्थिति थी कि वांगचुक को उनकी इच्छा के विरुद्ध अस्पताल ले जाना पड़ा।
सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ने अदालत को बताया कि:
- वांगचुक 18 दिनों से अधिक समय से उपवास पर थे।
- लगातार भूखे रहने और उमस भरे मौसम के कारण उनके शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) हो रही थी।
- लंबे उपवास से कीटोसिस (Ketosis) जैसी स्थिति बन सकती थी।
- शरीर में पोटैशियम का स्तर गिरने से हृदय और अन्य अंगों पर गंभीर असर पड़ सकता था।
- समय पर इलाज नहीं मिलने पर किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित होने का खतरा था।
सरकार ने कहा कि डॉक्टरों की सलाह के आधार पर ही उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया ताकि उनकी जान को किसी तरह का खतरा न हो।
मेदांता अस्पताल भेजने की मांग क्यों उठी?
सोनम वांगचुक की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने अदालत में कहा कि उन्हें निजी अस्पताल मेदांता में भर्ती कराया जाए।
उन्होंने दलील दी कि:
- मेदांता के डॉक्टर इलाज के लिए तैयार हैं।
- एम्बुलेंस की व्यवस्था भी की जा चुकी है।
- सफदरजंग अस्पताल में उनके वकीलों और निजी डॉक्टरों की पहुंच सीमित है।
- परिवार और टीम को उनके इलाज की पूरी जानकारी नहीं मिल पा रही है।
- मरीज को अपनी पसंद के डॉक्टर और अस्पताल चुनने का अधिकार मिलना चाहिए।
सरकार का जवाब
सरकार ने इस मांग का विरोध करते हुए कहा कि:
- सफदरजंग अस्पताल देश का प्रमुख सरकारी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल है।
- यहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की पूरी टीम उपलब्ध है।
- मरीज को सर्वोत्तम चिकित्सा सुविधा दी जा रही है।
- केवल निजी अस्पताल की इच्छा जताने से सरकारी अस्पताल की चिकित्सा व्यवस्था पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
इसी दौरान सरकार ने यह भी कहा कि देश के राष्ट्रपति जैसे उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों का इलाज भी सरकारी अस्पतालों में होता है, इसलिए सरकारी अस्पतालों की गुणवत्ता पर संदेह करना उचित नहीं है।
कोर्ट में आगे क्या हुआ?
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से निजी अस्पताल में शिफ्ट करने की मांग दोहराई गई। वहीं सरकार ने कहा कि वह फिलहाल चिकित्सा संबंधी तकनीकी बहस में नहीं जाना चाहती और अदालत के पहले दिए गए आदेशों का पालन कर रही है।
हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले पर आगे की सुनवाई जारी रखने का निर्णय लिया।
सरकार की स्वास्थ्य संबंधी दलील
सरकार ने अदालत को बताया कि लंबे समय तक उपवास करने से शरीर में कई गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं, जैसे:
- डिहाइड्रेशन (शरीर में पानी की कमी)
- इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन
- पोटैशियम का स्तर कम होना
- कीटोसिस की स्थिति
- किडनी और अन्य महत्वपूर्ण अंगों के प्रभावित होने का खतरा
इन्हीं संभावित जोखिमों को देखते हुए सोनम वांगचुक को तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया गया।
निष्कर्ष
यह मामला केवल सोनम वांगचुक के इलाज तक सीमित नहीं है, बल्कि मरीज की पसंद, चिकित्सा सुविधा के अधिकार और सरकार की जिम्मेदारी जैसे संवैधानिक व कानूनी प्रश्नों से भी जुड़ा हुआ है। एक ओर वांगचुक की ओर से निजी अस्पताल में इलाज की मांग की जा रही है, वहीं सरकार का कहना है कि सफदरजंग अस्पताल में सभी आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं और उनकी सुरक्षा तथा स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए ही उन्हें भर्ती कराया गया है। अब इस विवाद पर अंतिम निर्णय दिल्ली हाई कोर्ट की आगामी सुनवाई में स्पष्ट होगा।
