कवर्धा। शहर के एक निजी आवासीय स्कूल ‘गुरुकुल पब्लिक स्कूल’ में पढ़ने वाली 10वीं कक्षा की नाबालिग छात्रा के बच्चे को जन्म देने का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। मामले में कथित आरोपी के खिलाफ बीजापुर जिले में FIR दर्ज होने के बाद अब स्कूल प्रबंधन और हॉस्टल की निगरानी व्यवस्था भी सवालों के घेरे में आ गई है। आदिवासी विकास परिषद ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के लिए SIT गठित करने की मांग की है। परिषद ने मांग पूरी नहीं होने पर आंदोलन की चेतावनी भी दी है।

मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि छात्रा सरकारी उत्कर्ष योजना के तहत बीजापुर से कबीरधाम के निजी स्कूल में पढ़ाई करने आई थी और हॉस्टल में रह रही थी। आरोप है कि छुट्टियों के दौरान गांव में उसके साथ यौन अपराध हुआ। इसके बाद छात्रा करीब आठ महीने तक स्कूल के हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करती रही।
मामले में अब मुख्य सवाल सिर्फ आरोपी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी उठ रहा है कि इतने लंबे समय तक हॉस्टल में रहने वाली नाबालिग छात्रा की गर्भावस्था की जानकारी स्कूल प्रबंधन, वार्डन या महिला स्टाफ को क्यों नहीं हुई? क्या छात्रा का नियमित स्वास्थ्य परीक्षण होता था? यदि तबीयत बिगड़ने के बाद उसे घर ले जाया गया, तो उससे पहले स्कूल स्तर पर उसकी चिकित्सकीय जांच कराई गई थी या नहीं? इन सभी सवालों का जवाब जांच के बाद ही सामने आएगा।
छुट्टियों के दौरान घटना का आरोप
प्राप्त जानकारी के मुताबिक, बीजापुर जिले की रहने वाली नाबालिग छात्रा सरकारी उत्कर्ष योजना के तहत कबीरधाम के निजी आवासीय स्कूल में 10वीं कक्षा की पढ़ाई कर रही थी। वह स्कूल के हॉस्टल में रह रही थी।
आरोप है कि छुट्टियों के दौरान छात्रा के गांव में उसके साथ यौन अपराध हुआ। घटना के बाद भी छात्रा वापस स्कूल आई और करीब आठ महीने तक हॉस्टल में रही।
मामले में संबंधित थाने में कथित आरोपी के खिलाफ FIR दर्ज की जा चुकी है और पुलिस की कानूनी कार्रवाई जारी है।
तबीयत बिगड़ने पर परिजन घर ले गए
स्कूल के प्राचार्य मनोज राय के मुताबिक, 5 फरवरी को छात्रा की तबीयत बिगड़ने के बाद उसके परिजन उसे अपने साथ घर ले गए थे। इसके बाद स्कूल को छात्रा के परीक्षा में शामिल नहीं होने की जानकारी मिली।
बताया गया है कि 12 फरवरी को छात्रा ने बच्चे को जन्म दिया। इसके बाद मामला सामने आया और संबंधित पुलिस थाने में आरोपी के खिलाफ कार्रवाई शुरू हुई।
हालांकि, छात्रा की गर्भावस्था की जानकारी स्कूल में कब और किस स्तर पर सामने आई, इसको लेकर अब सवाल उठ रहे हैं।
आठ महीने तक हॉस्टल में रही छात्रा, फिर भी क्यों नहीं लगी भनक?
इस मामले का सबसे अहम पहलू हॉस्टल की निगरानी व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवाल हैं। छात्रा करीब आठ महीने तक हॉस्टल में रही। ऐसे में यह जानना जरूरी होगा कि इस अवधि के दौरान उसकी स्वास्थ्य स्थिति की निगरानी किस तरह की जाती थी।
सवाल यह भी है कि क्या हॉस्टल में रहने वाली छात्राओं का नियमित स्वास्थ्य परीक्षण कराया जाता था? क्या वार्डन या महिला स्टाफ छात्राओं के स्वास्थ्य और व्यवहार में होने वाले बदलावों पर नजर रखते थे? छात्रा की तबीयत बिगड़ने से पहले क्या उसने किसी कर्मचारी या अधिकारी को अपनी परेशानी बताई थी?
इन सवालों के जवाब जांच के दौरान सामने आ सकते हैं। फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर स्कूल प्रबंधन की किसी लापरवाही को साबित तथ्य के तौर पर नहीं कहा जा सकता।
स्कूल का नाम पहले भी विवाद में आया था
इस मामले के सामने आने के बाद स्कूल की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर इसलिए भी चर्चा तेज हो गई है क्योंकि बताया जा रहा है कि इस संस्थान का नाम इससे पहले भी एक नाबालिग छात्रा से जुड़े कथित यौन अपराध के मामले में सामने आ चुका है।
उस पुराने मामले में स्कूल के एक कर्मचारी और तत्कालीन प्राचार्य के खिलाफ पुलिस कार्रवाई की जानकारी सामने आई थी। ऐसे में वर्तमान घटना के बाद स्कूल में छात्राओं की सुरक्षा, हॉस्टल की निगरानी और प्रबंधन की जिम्मेदारी को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
हालांकि, पुराने मामले और वर्तमान घटना के बीच किसी तरह का सीधा संबंध है या नहीं, यह जांच का विषय है।
वर्तमान प्राचार्य ने कहा- घटना मेरे कार्यकाल से पहले की
मामले को लेकर स्कूल के वर्तमान प्राचार्य मनोज राय ने कहा कि संबंधित घटना उनके कार्यकाल से पहले की है। उनके अनुसार, छात्रा को उसके परिजन अपने साथ ले गए थे और बाद में उसके परीक्षा में शामिल नहीं होने की जानकारी मिली थी।
जब छात्रा के स्वास्थ्य परीक्षण और हॉस्टल में उसकी निगरानी से जुड़े सवाल पूछे गए तो प्राचार्य ने इन विषयों पर तत्कालीन प्राचार्य से जवाब लिए जाने की बात कही।
इस बयान के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि जिस अवधि में छात्रा हॉस्टल में रह रही थी, उस समय स्कूल प्रशासन और हॉस्टल व्यवस्था की जिम्मेदारी किस अधिकारी या कर्मचारी के पास थी।
आदिवासी विकास परिषद ने की SIT जांच की मांग
मामले को लेकर आदिवासी विकास परिषद ने अब मोर्चा खोल दिया है। परिषद के कामू बैगा ने मांग की है कि केवल कथित आरोपी के खिलाफ कार्रवाई तक जांच सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि छात्रा की सुरक्षा और हॉस्टल की निगरानी व्यवस्था की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
परिषद का कहना है कि यदि छात्रा लंबे समय तक हॉस्टल में रह रही थी, तो इस दौरान उसकी सुरक्षा और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी स्कूल प्रबंधन की भी थी। इसलिए पूरे घटनाक्रम की जांच व्यापक स्तर पर किए जाने की आवश्यकता है।
परिषद ने SIT गठित कर मामले की निष्पक्ष जांच कराने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। मांग पूरी नहीं होने पर आंदोलन की चेतावनी भी दी गई है।
जांच में इन सवालों के जवाब जरूरी
इस पूरे मामले में जांच एजेंसियों के सामने कई अहम सवाल हैं—
- छात्रा की गर्भावस्था की जानकारी स्कूल प्रबंधन को कब हुई?
- हॉस्टल में छात्राओं का नियमित स्वास्थ्य परीक्षण होता था या नहीं?
- छात्रा की तबीयत बिगड़ने से पहले क्या उसने किसी स्टाफ या वार्डन से अपनी परेशानी साझा की थी?
- हॉस्टल में वार्डन और महिला स्टाफ की निगरानी व्यवस्था कैसी थी?
- छात्रा के घर जाने से पहले स्कूल स्तर पर उसका स्वास्थ्य परीक्षण कराया गया था या नहीं?
- घटना की जानकारी मिलने के बाद स्कूल प्रबंधन ने क्या कदम उठाए?
- पुराने मामले के बाद छात्राओं की सुरक्षा के लिए क्या व्यवस्थाएं की गई थीं?
इन सवालों का जवाब पुलिस जांच और प्रशासनिक जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
अब आरोपी के साथ स्कूल प्रबंधन की भूमिका की भी होगी चर्चा
फिलहाल कथित आरोपी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई जारी है। लेकिन इस मामले ने आवासीय स्कूलों में पढ़ने वाले नाबालिग विद्यार्थियों की सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है।
आदिवासी विकास परिषद की SIT जांच की मांग के बाद अब देखना होगा कि प्रशासन इस मांग पर क्या कदम उठाता है। यदि जांच में स्कूल या हॉस्टल स्तर पर किसी तरह की लापरवाही सामने आती है तो संबंधित जिम्मेदार लोगों पर भी कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है।
फिलहाल यह स्पष्ट करना जरूरी है कि स्कूल प्रबंधन की लापरवाही या किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका के संबंध में लगाए जा रहे सवालों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। इन आरोपों की वास्तविकता जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगी।
यह मामला एक बार फिर यह सवाल उठाता है कि आवासीय स्कूलों और छात्रावासों में पढ़ने वाले नाबालिग बच्चों की सुरक्षा के लिए केवल शिक्षा व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। उनकी नियमित स्वास्थ्य निगरानी, सुरक्षित वातावरण, शिकायत व्यवस्था और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है।
