धमतरी। छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले से सामाजिक बहिष्कार का एक गंभीर और झकझोर देने वाला मामला सामने आया है। भखारा थाना क्षेत्र के तर्रागोंदी गांव में साहू परिवार के 31 सदस्यों के सामाजिक बहिष्कार का आरोप लगाया गया है। पीड़ित परिवार का दावा है कि पिछले करीब दो वर्षों से उन्हें गांव में सामान्य जीवन जीने तक का अधिकार नहीं मिल रहा है।
परिवार में बुजुर्गों और महिलाओं के साथ 7 बच्चे भी शामिल हैं। पीड़ितों के मुताबिक, दो साल पहले गांव में अतिक्रमण कर घर बनाने के आरोप को लेकर विवाद शुरू हुआ था। इसके बाद पंचायत स्तर पर परिवार का कथित रूप से सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया।

परिवार का आरोप है कि इसके बाद गांव में उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जाने लगा, जैसे उन्होंने कोई सामाजिक अपराध कर दिया हो। बातचीत करने, खेतों में काम करने, दुकान से सामान खरीदने और सुख-दुख में शामिल होने तक पर रोक होने की बात परिवार ने कही है।
‘गांव में कोई हमसे बात नहीं करता’
पीड़ित परिवार के सदस्यों के मुताबिक, सामाजिक बहिष्कार के बाद गांव के लोगों को उनसे दूरी बनाए रखने के लिए कहा गया। परिवार का आरोप है कि यदि कोई व्यक्ति उनसे सामान्य बातचीत भी करता है तो उस पर अर्थदंड लगाने की बात कही जाती है।
परिवार के मुताबिक, उनके खेतों में काम करने के लिए भी गांव के लोग तैयार नहीं होते। इससे खेती-किसानी से जुड़े कामों में भी परेशानी होती है। परिवार का कहना है कि गांव में रहते हुए भी उन्हें सामाजिक और आर्थिक रूप से अलग-थलग कर दिया गया है।
उनका दावा है कि गांव के एक प्रभावशाली व्यक्ति जयराम के बारे में कहा जाता है कि गांव में उसकी बात मानी जाती है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और पूरे मामले की वास्तविक स्थिति प्रशासनिक जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
बच्चों तक को नहीं मिल रहा सामान्य व्यवहार
इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू परिवार में शामिल 7 मासूम बच्चों से जुड़ा है। परिवार का आरोप है कि जब बच्चे गांव की दुकानों पर बिस्किट या चॉकलेट खरीदने जाते हैं तो दुकानदार उन्हें सामान देने से इनकार कर देते हैं।
पीड़ितों के अनुसार, बच्चों से कहा जाता है कि उनके लिए यहां कुछ नहीं है और वे वापस चले जाएं।
यदि परिवार के आरोप सही पाए जाते हैं तो यह स्थिति केवल सामाजिक विवाद तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसका सबसे अधिक असर उन बच्चों पर पड़ता है, जिनका इस विवाद से कोई लेना-देना नहीं है। सामान्य चीजें खरीदने के लिए बच्चों को भी सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है।
‘अपने ही गांव में कैद जैसा जीवन’
पीड़ित परिवार ने अपनी स्थिति को खुली जेल जैसा बताया है। उनका कहना है कि वे अपने ही घर में रह रहे हैं, लेकिन गांव के बाकी लोगों से उनका संपर्क लगभग खत्म हो गया है।
परिवार के मुताबिक, रोजमर्रा का सामान खरीदने के लिए उन्हें दूसरे गांव जाना पड़ता है। इससे समय और पैसे दोनों की परेशानी होती है।
बीमारी की स्थिति में भी उन्हें स्थानीय स्तर पर मदद या सुविधाएं मिलने में दिक्कत होने का आरोप है। डॉक्टर या अन्य जरूरी सामान के लिए उन्हें गांव से बाहर जाना पड़ता है।
परिवार का कहना है कि दो साल से ऐसी परिस्थितियों में रहने के कारण उन्हें मानसिक और सामाजिक रूप से काफी परेशानी झेलनी पड़ रही है।
सुख-दुख में भी शामिल होने पर कथित रोक
पीड़ित परिवार ने आरोप लगाया कि सामाजिक बहिष्कार के कथित फरमान के तहत गांव के लोगों को उनके सुख-दुख में शामिल होने से भी रोका गया है।
परिवार का कहना है कि खुशी के किसी अवसर पर गांव से कोई व्यक्ति उनके साथ शामिल नहीं होता। वहीं किसी सदस्य की मृत्यु होने पर अंतिम संस्कार और अन्य सामाजिक रस्मों में सहयोग मिलने को लेकर भी उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है।
इस तरह परिवार का दावा है कि उन्हें सामाजिक जीवन की मुख्यधारा से पूरी तरह अलग कर दिया गया है।
दो साल बाद कलेक्टर कार्यालय पहुंचा परिवार
लगातार परेशानी झेलने के बाद परिवार के सदस्यों ने आखिरकार जिला प्रशासन से मदद की गुहार लगाई। पीड़ित परिवार कलेक्टर कार्यालय पहुंचा और अधिकारियों को अपनी समस्या बताकर सामाजिक बहिष्कार खत्म कराने तथा दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
परिवार ने प्रशासन से कहा कि उन्हें गांव में सम्मान के साथ सामान्य जीवन जीने का अधिकार दिया जाए। साथ ही बच्चों और महिलाओं को सामाजिक बहिष्कार के कारण हो रही परेशानी से राहत दिलाई जाए।
जिला प्रशासन ने जांच और कार्रवाई का दिया आश्वासन
मामला सामने आने के बाद जिला प्रशासन ने पीड़ित परिवार को जांच कर उचित कार्रवाई का आश्वासन दिया है।
अब प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करने की है। जांच में यह पता लगाया जाना जरूरी होगा कि परिवार के सामाजिक बहिष्कार का फैसला किस स्तर पर लिया गया, क्या वास्तव में पंचायत या किसी अन्य समूह की ओर से ऐसा कोई आदेश दिया गया था और परिवार के साथ किस तरह का व्यवहार किया जा रहा है।
यदि जांच में सामाजिक बहिष्कार या किसी व्यक्ति को ऐसा करने के लिए मजबूर करने की पुष्टि होती है, तो संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है।
पंचायत के फैसले से ऊपर है कानून
सामाजिक जीवन में पंचायतों की अपनी भूमिका हो सकती है, लेकिन किसी परिवार को मनमाने तरीके से समाज से अलग करना, उनसे बातचीत पर रोक लगाना या रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं तक पहुंच में बाधा डालना गंभीर विषय है।
किसी भी विवाद का समाधान कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत होना चाहिए। यदि परिवार पर अतिक्रमण का आरोप है तो संबंधित सरकारी विभाग और प्रशासन कानून के अनुसार जांच और कार्रवाई कर सकते हैं। लेकिन किसी परिवार को कथित सामाजिक बहिष्कार के जरिए दंडित करना अलग विषय है।
सबसे बड़ा सवाल बच्चों के भविष्य का
इस मामले में सबसे गंभीर चिंता परिवार के सात बच्चों को लेकर है। किसी पारिवारिक या जमीन संबंधी विवाद का असर बच्चों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ना उनके मानसिक और सामाजिक विकास के लिए भी परेशानी पैदा कर सकता है।
बच्चों को दुकान से सामान्य खाद्य सामग्री तक न मिलना, ग्रामीण समाज से दूरी और लगातार उपेक्षा का सामना करना गंभीर स्थिति है। ऐसे मामलों में प्रशासन को केवल विवाद की जांच तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि प्रभावित परिवार और बच्चों की सुरक्षा एवं आवश्यक सुविधाओं तक पहुंच भी सुनिश्चित करनी चाहिए।
अब प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी नजर
तर्रागोंदी गांव का यह मामला सामने आने के बाद अब सभी की नजर जिला प्रशासन की जांच और आगे की कार्रवाई पर है। परिवार पिछले दो साल से जिस सामाजिक बहिष्कार का आरोप लगा रहा है, उसकी वास्तविकता जांच के बाद स्पष्ट होगी।
फिलहाल पीड़ित परिवार की मांग है कि उन्हें सामान्य सामाजिक जीवन, सुरक्षा और सम्मान के साथ रहने का अधिकार मिले। साथ ही जिन लोगों की भूमिका सामाजिक बहिष्कार में सामने आए, उनके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
यह मामला केवल एक परिवार की शिकायत नहीं है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक दबाव, पंचायत व्यवस्था और नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन से जुड़ा गंभीर सवाल भी खड़ा करता है। अब देखना होगा कि प्रशासन की जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं और परिवार को कब तक राहत मिलती है।
