मध्य प्रदेशमें नवजात बच्चों की मौत के आंकड़ों ने एक बार फिर स्वास्थ्य व्यवस्था और गर्भावस्था देखभाल को लेकर चिंता बढ़ा दी है। जनगणना निदेशालय की सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम यानी SRS रिपोर्ट में जहां शिशु मृत्यु दर में सुधार और दो अंकों की गिरावट दर्ज की गई है, वहीं नवजात मृत्यु दर अब भी बेहद चिंताजनक बनी हुई है।

रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में प्रति हजार जन्म लेने वाले 26 बच्चे ऐसे हैं, जो जन्म के सिर्फ 28 दिनों के भीतर ही दम तोड़ देते हैं। यही नहीं, पांच साल की उम्र पूरी होने से पहले 41 बच्चों की मौत हो रही है। इन आंकड़ों ने साफ कर दिया है कि मातृ और शिशु स्वास्थ्य सेवाओं में अब भी कई गंभीर कमियां मौजूद हैं।
हालांकि स्वास्थ्य विभाग इसे बड़ी उपलब्धि बताकर शिशु मृत्यु दर में आई गिरावट का दावा कर रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि नवजात मौतों के आंकड़े असली स्थिति को उजागर कर रहे हैं। डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार गर्भावस्था के दौरान सही देखभाल की कमी, महिलाओं में कुपोषण, समय पर इलाज न मिलना, संक्रमण और इमरजेंसी स्थिति में सीजर डिलीवरी की सुविधा का अभाव नवजात मौतों की बड़ी वजह बन रहे हैं।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि पूरे प्रदेश में केवल 140 सरकारी अस्पताल ऐसे हैं, जहां सीजर डिलीवरी की सुविधा उपलब्ध है। ग्रामीण और दूरदराज इलाकों में रहने वाली गर्भवती महिलाओं को समय पर विशेषज्ञ इलाज नहीं मिल पाता, जिसके कारण प्रसव के दौरान जटिलताएं बढ़ जाती हैं। कई मामलों में अस्पताल तक पहुंचने में देरी भी नवजात और मां दोनों की जान पर भारी पड़ती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच, पोषण और सुरक्षित प्रसव व्यवस्था को मजबूत नहीं किया गया, तो नवजात मृत्यु दर में सुधार लाना मुश्किल होगा। खासकर आदिवासी और पिछड़े क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति अब भी कमजोर मानी जा रही है।
