छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में सक्रिय नक्सली नेटवर्क को बड़ा झटका तब लगा, जब सुरक्षा बलों ने 13 अप्रैल को कांकेर जिले के जंगलों में हुई मुठभेड़ में एक महिला नक्सली कमांडर को मार गिराया। बाद में उसकी पहचान रूपी के रूप में हुई, जो संगठन में एसीएम (एरिया कमेटी मेंबर) स्तर की जिम्मेदार कैडर थी।
🔫 कैसे हुई मुठभेड़?
कांकेर जिले के छोटेबेठिया थाना क्षेत्र के माचपल्ली, आरामझोरा और हिडूर के घने जंगलों में नक्सलियों की मौजूदगी की सूचना मिलने पर सुरक्षाबलों ने संयुक्त सर्च ऑपरेशन शुरू किया।
- जवानों के पहुंचते ही नक्सलियों ने अचानक फायरिंग शुरू कर दी
- जवाबी कार्रवाई में सुरक्षाबलों ने मोर्चा संभाला
- दोनों ओर से काफी देर तक गोलीबारी चली
मुठभेड़ के बाद इलाके की सर्चिंग में एक महिला नक्सली का शव बरामद हुआ, जिसकी पहचान रूपी के रूप में की गई।

👤 कौन थी रूपी?
रूपी नक्सल संगठन की एक अहम सदस्य थी:
- एसीएम (Area Committee Member) रैंक की कमांडर
- लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों की वांटेड सूची में शामिल
- बस्तर में सक्रिय आखिरी तेलुगू महिला नक्सली कैडर मानी जा रही थी
उसकी मौत को नक्सल संगठन के लिए एक रणनीतिक नुकसान माना जा रहा है।
⚰️ अंतिम संस्कार और विवाद
कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद रूपी का शव उसके गृह राज्य तेलंगाना के मेडक जिले ले जाया गया, जहां उसका अंतिम संस्कार किया गया।
यहीं से विवाद शुरू हुआ—
- अंतिम संस्कार के दौरान कुछ लोग लाल झंडे लेकर नाचते नजर आए
- ‘शहीद’ के रूप में रूपी को विदाई दी गई
- इस दौरान विवादित ‘हिडमा सांग’ भी गाया गया
🎶 ‘हिडमा सांग’ क्यों बना मुद्दा?
यह गीत कुख्यात नक्सली नेता मदवी हिडमा से जुड़ा माना जाता है, जो सुरक्षा एजेंसियों की मोस्ट वांटेड सूची में शामिल रहा है।
- इस तरह के गीत नक्सली विचारधारा का महिमामंडन माने जाते हैं
- सार्वजनिक रूप से ऐसे कार्यक्रम सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बनते हैं
🚨 सुरक्षा एजेंसियों की बढ़ी सतर्कता
अंतिम संस्कार का वीडियो सामने आने के बाद:
- खुफिया एजेंसियां सक्रिय हो गई हैं
- यह जांच की जा रही है कि कार्यक्रम में शामिल लोग कौन थे
- क्या यह संगठित समर्थन का संकेत है या सिर्फ स्थानीय स्तर की घटना
⚖️ बड़ा सवाल
यह घटना कई सवाल खड़े करती है:
- क्या नक्सलियों के प्रति कुछ क्षेत्रों में अब भी सहानुभूति मौजूद है?
- क्या इस तरह के आयोजनों पर सख्त निगरानी की जरूरत है?
📌 निष्कर्ष
रूपी की मुठभेड़ में मौत सुरक्षा बलों की एक बड़ी सफलता मानी जा रही है, लेकिन उसके अंतिम संस्कार के दौरान सामने आए दृश्य यह संकेत देते हैं कि नक्सल विचारधारा का प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
यह मामला अब सिर्फ एक मुठभेड़ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आंतरिक सुरक्षा और वैचारिक लड़ाई का हिस्सा बन गया है।
