दंतेवाड़ा। विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक बस्तर दशहरा की परंपराओं के निर्वहन के लिए मां दंतेश्वरी की पावन डोली और राजछत्र रविवार को दंतेवाड़ा से जगदलपुर के लिए रवाना हो गए। शारदीय नवरात्र की अष्टमी के अवसर पर आयोजित इस धार्मिक आयोजन में आस्था, लोक संस्कृति और परंपरा का अद्भुत संगम देखने को मिला। गाजे-बाजे, पारंपरिक वाद्य यंत्रों, लोक नृत्य और मां के जयकारों के बीच श्रद्धालुओं ने डोली को भावभीनी विदाई दी।

मां दंतेश्वरी की डोली की रवानगी के दौरान पूरा दंतेवाड़ा भक्तिमय वातावरण में डूबा नजर आया। बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस ऐतिहासिक यात्रा के साक्षी बने। जगह-जगह मां के जयकारे गूंजते रहे और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ डोली को जगदलपुर के लिए रवाना किया गया। मंदिर के मुख्य द्वार पर तैनात पुलिस बल ने सलामी देकर मां दंतेश्वरी को सम्मान अर्पित किया।
जयकारों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के बीच दी गई विदाई
मां दंतेश्वरी की डोली और राजछत्र की रवानगी बस्तर की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस अवसर पर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह दिखाई दिया। पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन, लोक नृत्य और भक्तिमय जयकारों के बीच मां की डोली को विदाई दी गई।
नवरात्र की अष्टमी पर आयोजित इस कार्यक्रम में स्थानीय परंपराओं की झलक देखने को मिली। श्रद्धालुओं के लिए यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत और पीढ़ियों से चली आ रही आस्था से जुड़ने का अवसर भी है।
मां दंतेश्वरी बस्तर क्षेत्र की आराध्य देवी मानी जाती हैं। उनकी डोली का बस्तर दशहरा में शामिल होने के लिए दंतेवाड़ा से जगदलपुर पहुंचना इस पर्व की प्रमुख धार्मिक परंपराओं में शामिल है।
क्या है मावली परघाव की परंपरा?
बस्तर दशहरा की सबसे महत्वपूर्ण रस्मों में मावली परघाव का विशेष स्थान है। यह परंपरा लगभग 800 वर्षों से चली आ रही है। इसके अंतर्गत मां दंतेश्वरी की डोली दंतेवाड़ा से जगदलपुर पहुंचती है, जहां मावली माता से उनका पारंपरिक मिलन होता है।
इस रस्म को बस्तर की धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक राजपरंपरा और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक माना जाता है। मावली परघाव के दौरान बस्तर की परंपराओं और देवी-देवताओं के प्रति लोगों की श्रद्धा विशेष रूप से दिखाई देती है।
बस्तर दशहरा की खासियत यह है कि इसकी परंपराएं स्थानीय समाज, आदिवासी संस्कृति और धार्मिक मान्यताओं से गहराई से जुड़ी हुई हैं। यही वजह है कि यह पर्व केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि बस्तर की विशिष्ट पहचान और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है।
दंतेवाड़ा से जगदलपुर तक निभाई जाएगी परंपरा
मां दंतेश्वरी की डोली निर्धारित पूजा स्थलों पर रुकते हुए जगदलपुर पहुंचेगी। यात्रा के दौरान परंपराओं के अनुसार पूजा-अर्चना की जाएगी। जगदलपुर पहुंचने के बाद बस्तर दशहरा से जुड़ी ऐतिहासिक रस्मों का निर्वहन किया जाएगा।
मां की डोली और राजछत्र की उपस्थिति बस्तर दशहरा के धार्मिक महत्व को और बढ़ाती है। इस आयोजन के माध्यम से क्षेत्र की सदियों पुरानी मान्यताएं और परंपराएं आज भी जीवंत बनी हुई हैं। स्थानीय लोगों के लिए मां की डोली की यात्रा श्रद्धा और गौरव से जुड़ा अवसर है।
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, मां दंतेश्वरी की डोली और राजछत्र 27 अक्टूबर को वापस दंतेवाड़ा के लिए रवाना होंगे।
बस्तर की संस्कृति और आस्था का प्रतीक है दशहरा
बस्तर दशहरा देश के विशिष्ट सांस्कृतिक आयोजनों में गिना जाता है। इसकी पहचान यहां की पारंपरिक रस्मों, आदिवासी संस्कृति और स्थानीय देवी-देवताओं के प्रति गहरी आस्था से बनी है। यह पर्व अपनी अनूठी परंपराओं के कारण देश के अन्य दशहरा आयोजनों से अलग पहचान रखता है।
मां दंतेश्वरी की डोली और राजछत्र की यात्रा इसी सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। दंतेवाड़ा से जगदलपुर तक की यह यात्रा धार्मिक श्रद्धा के साथ बस्तर के ऐतिहासिक संबंधों और सामुदायिक एकता को भी दर्शाती है।
नवरात्र की अष्टमी पर मां की डोली को दी गई भावभीनी विदाई के साथ बस्तर दशहरा की परंपराओं का एक और महत्वपूर्ण अध्याय आगे बढ़ा। श्रद्धालुओं की आस्था, पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज और मां के जयकारों ने इस अवसर को यादगार बना दिया।
