नई दिल्ली। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं के सुप्रीम कोर्ट परिसर तक मार्च करने के मामले में गुरुवार को सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने अहम टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को कोई डरा-धमका नहीं सकता और इस तरह के प्रयास बेहद कमजोर हैं, जिन पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है। मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि न्यायपालिका वास्तविक दुनिया से कटकर नहीं बैठी है और उसे घटनाक्रम की जानकारी रहती है।
यह मामला उस घटनाक्रम से जुड़ा है, जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के विरोध में विपक्षी नेता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। इस घटनाक्रम को लेकर अदालत परिसर में राजनीतिक गतिविधियों, नारेबाजी और न्यायपालिका की गरिमा से जुड़े सवाल उठाए गए। वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने सुप्रीम कोर्ट परिसर में राजनीतिक जुलूस निकाले जाने पर आपत्ति जताई और इसे न्यायपालिका पर दबाव बनाने की कोशिश बताया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने संबंधित कानूनी एजेंसियों को CCTV फुटेज और अन्य डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट परिसर से संबंधित रिकॉर्ड भी संरक्षित रखा जाए। साथ ही, निजी पक्षों के पास उपलब्ध संबंधित सामग्री पुलिस को देने की बात भी कही गई। इससे मामले की जांच में उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने पर जोर दिया गया है।
CJI सूर्यकांत बोले- हमें हर चीज की जानकारी है
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने सुप्रीम कोर्ट परिसर में राजनीतिक जुलूस निकाले जाने पर गंभीर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि अदालत परिसर में इस तरह की गतिविधियां अस्वीकार्य हैं और इन्हें न्यायपालिका को डराने-धमकाने तथा दबाव में लाने के प्रयास के तौर पर देखा जाना चाहिए।
इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि कोई भी न्यायपालिका को डरा-धमका नहीं सकता। उन्होंने यह भी कहा कि अदालतें वास्तविक दुनिया से अलग होकर काम नहीं करतीं और उन्हें बाहर हो रही घटनाओं की जानकारी रहती है।
CJI की टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब विपक्षी नेताओं के सुप्रीम कोर्ट पहुंचने और परिसर में हुए घटनाक्रम को लेकर कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है। अदालत के समक्ष यह सवाल भी है कि न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखते हुए नागरिकों और राजनीतिक दलों के विरोध के अधिकार से जुड़े मुद्दों को किस तरह देखा जाए।
CCTV और डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने मामले से संबंधित CCTV फुटेज और डिजिटल रिकॉर्ड संरक्षित रखने का निर्देश दिया है। इसका उद्देश्य घटनाक्रम से जुड़े उपलब्ध साक्ष्यों को सुरक्षित रखना है, ताकि जरूरत पड़ने पर जांच और न्यायिक कार्यवाही में उनका उपयोग किया जा सके।
अदालत ने संबंधित कानूनी एजेंसियों को रिकॉर्ड सुरक्षित रखने को कहा। सुप्रीम कोर्ट परिसर में लगे कैमरों की फुटेज और अन्य डिजिटल सामग्री भी इस निर्देश के दायरे में बताई गई है। निजी पक्षों के पास मौजूद संबंधित सामग्री पुलिस को सौंपने की बात भी कही गई।
इस निर्देश को मामले की जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का आदेश अपने आप में किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोपों को सही साबित नहीं करता। घटनाक्रम और संबंधित पक्षों की भूमिका का आकलन उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा।
SG तुषार मेहता बोले- सरकार ने माफी नहीं मांगी
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इंटरनेट बंद करने और प्रदर्शन से संबंधित अवमानना मामले में दाखिल जवाब को लेकर स्पष्टीकरण दिया। उन्होंने कहा कि अदालत के अवमानना नोटिस के जवाब में सरकार की ओर से जो पक्ष रखा गया है, उसे मीडिया और सोशल मीडिया पर बिना शर्त माफी के रूप में पेश किया जा रहा है, जबकि ऐसा नहीं है।
तुषार मेहता ने कहा कि वह मामले के गुण-दोष से अलग इस पहलू पर स्थिति स्पष्ट करना चाहते हैं। उनके मुताबिक, अवमानना नोटिस के जवाब को लेकर प्रकाशित खबरों में यह धारणा बन रही है कि सरकार ने माफी मांग ली है। उन्होंने इस व्याख्या पर आपत्ति जताते हुए कहा कि सरकार ने माफी नहीं मांगी है।
यह स्पष्टीकरण ऐसे समय आया है, जब प्रदर्शन के दौरान इंटरनेट सेवाओं पर रोक, सार्वजनिक परिवहन में व्यवधान और पुलिस की कार्रवाई को लेकर अदालत में कई सवाल उठाए गए हैं। इन मामलों में सरकार और संबंधित एजेंसियों का पक्ष तथा याचिकाकर्ताओं की आपत्तियां न्यायिक समीक्षा के दायरे में हैं।
जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
दिल्ली के जंतर-मंतर को अधिकृत प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाए जाने का मामला भी सुनवाई के दौरान उठा। इस संबंध में दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने का निर्णय सुप्रीम कोर्ट के किसी आदेश के कारण नहीं लिया गया था, बल्कि एक समिति ने इस संबंध में सुझाव दिया था।
इस पर अदालत ने कहा कि पहले सरकार का जवाब देखा जाएगा। यदि जवाब से संतुष्टि नहीं हुई, तो कानून के अनुसार आगे कार्रवाई की जाएगी।
जस्टिस जोयमाल्या बागची ने कहा कि अदालत इस बात की जांच करेगी कि जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में हटाने का फैसला उचित विचार-विमर्श के बाद लिया गया था या नहीं।
जंतर-मंतर लंबे समय से राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और विभिन्न समूहों के विरोध प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र रहा है। ऐसे में इसे अधिकृत प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने का मामला शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन से जुड़ा है।
BNS की धारा 163 और पुलिस की कार्रवाई पर भी नोटिस
जंतर-मंतर मामले के साथ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 की वैधता और पुलिस की निवारक कार्रवाई से जुड़े सवाल भी उठाए गए। इस संबंध में अदालत ने नोटिस जारी किया है।
BNSS की धारा 163 के तहत सक्षम अधिकारी कुछ परिस्थितियों में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए निषेधात्मक आदेश जारी कर सकते हैं। हालांकि, ऐसे आदेशों का इस्तेमाल किन परिस्थितियों में किया गया, उनका दायरा क्या था और वे कानून के अनुरूप थे या नहीं, यह संबंधित तथ्यों के आधार पर तय होगा।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष इन मुद्दों पर सरकार और पुलिस का पक्ष आने के बाद आगे की स्थिति स्पष्ट होगी।
महिला पत्रकार से कथित अभद्रता पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता
सुनवाई के दौरान प्रदर्शन स्थल पर महिला पत्रकारों के साथ कथित अभद्रता और पुलिस कार्रवाई से जुड़े आरोपों पर भी चर्चा हुई। वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने महिला पत्रकारों से संबंधित शिकायतों का मुद्दा उठाया था। उन्होंने बताया कि प्रदर्शन को कवर करने वाली पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार और हिरासत से संबंधित शिकायतें सामने आई हैं।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने महिला पत्रकार की ओर से लगाए गए आरोपों को गंभीर बताया और मामले की जांच जल्द पूरी करने की जरूरत पर जोर दिया।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि प्रदर्शन स्थल पर यह पहचानना हमेशा आसान नहीं होता कि कौन पत्रकार है और कौन सोशल मीडिया के लिए वीडियो बना रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी महिला के साथ अभद्रता नहीं होनी चाहिए, चाहे वह पत्रकार हो या महिला पुलिसकर्मी।
अदालत के समक्ष इस मामले में आरोपों की जांच और संबंधित पक्षों के जवाब महत्वपूर्ण होंगे। फिलहाल, आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्धारण जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही किया जाएगा।
पत्रकारों की सुरक्षा और प्रदर्शन के अधिकार पर बहस
इस मामले ने सार्वजनिक प्रदर्शनों की कवरेज करने वाले पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। पत्रकारों को घटनास्थल पर रिपोर्टिंग करने के दौरान सुरक्षा मिलनी चाहिए, वहीं पुलिस को भी कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी निभानी होती है।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उठे सवालों में यह शामिल है कि प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों की पहचान, उनके साथ व्यवहार और हिरासत जैसी परिस्थितियों में किन प्रक्रियाओं का पालन किया गया।
महिला पत्रकारों की ओर से लगाए गए आरोपों की जांच जल्द पूरी करने पर अदालत की टिप्पणी इस मुद्दे की गंभीरता को रेखांकित करती है। हालांकि, किसी भी पक्ष की जिम्मेदारी तय करने के लिए जांच के निष्कर्ष और उपलब्ध साक्ष्य जरूरी होंगे।
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बाद अब संबंधित पक्षों के जवाब, CCTV फुटेज और डिजिटल रिकॉर्ड के संरक्षण तथा महिला पत्रकारों से जुड़ी शिकायतों की जांच पर नजर रहेगी।
जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने के मामले में केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस के जवाब भी महत्वपूर्ण होंगे। अदालत यह देखेगी कि संबंधित निर्णय किस आधार पर लिया गया और क्या उसमें आवश्यक विचार-विमर्श किया गया था।
राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं के सुप्रीम कोर्ट मार्च से जुड़े घटनाक्रम में भी अदालत के निर्देशों और जांच के निष्कर्षों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में न्यायपालिका की गरिमा, प्रदर्शन के अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था और पत्रकारों की सुरक्षा जैसे कई अहम मुद्दे सामने आए। अदालत ने रिकॉर्ड सुरक्षित रखने और संबंधित मामलों में जवाब तलब करने के जरिए आगे की न्यायिक प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं।

