रायपुर : छत्तीसगढ़ में नगरीय निकाय चुनाव की आहट के साथ ही प्रदेश के चार बड़े नगर निगमों की सियासत गरमा गई है. भिलाई, भिलाई-चरौदा, रिसाली और बिरगांव, चारों नगर निगम फिलहाल कांग्रेस के कब्जे में हैं. लेकिन प्रदेश की सत्ता में काबिज भाजपा अब इन शहरी किलों में सेंध लगाने की तैयारी में जुट गई है. बीजेपी ने प्रभारी और सह-प्रभारियों की नियुक्ति कर चुनावी चक्रव्यूह तैयार करना शुरू कर दिया है, तो कांग्रेस भी अपने कब्जे वाले निगमों को बचाने के लिए संगठन को सक्रिय कर रही है. मुकाबला सिर्फ चार नगर निगमों की सत्ता का नहीं है. भिलाई-चरौदा में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के प्रभाव की परीक्षा होगी, तो रिसाली में पूर्व गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू की राजनीतिक पकड़ भी कसौटी पर होगी. यही वजह है कि इन निकाय चुनावों को स्थानीय सरकार के चुनाव से कहीं आगे, कांग्रेस और भाजपा के बीच शहरी राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई के तौर पर देखा जा रहा है.

कांग्रेस के कब्जे में चारों निगम
आगामी नगरीय निकाय चुनाव में भिलाई, भिलाई-चरौदा, रिसाली और बिरगांव सबसे अहम राजनीतिक केंद्र बनकर सामने आए हैं. चारों नगर निगमों में फिलहाल कांग्रेस का कब्जा है. ऐसे में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने मौजूदा राजनीतिक प्रभाव और स्थानीय संगठन को बचाए रखने की है. दूसरी तरफ प्रदेश की सत्ता भाजपा के पास है.भाजपा की कोशिश है कि राज्य सरकार के कामकाज, संगठन की ताकत और स्थानीय स्तर पर मजबूत उम्मीदवारों के जरिए कांग्रेस के इन शहरी गढ़ों में सेंध लगाई जाए. महापौर पद के साथ-साथ पार्षदों की अधिक से अधिक सीटें हासिल करना भाजपा की रणनीति का अहम हिस्सा है. यानी इस चुनाव में एक तरफ कांग्रेस की स्थानीय पकड़ है, तो दूसरी तरफ भाजपा के पास सत्ता और संगठन की ताकत. यही समीकरण इन चारों नगर निगमों के चुनाव को दिलचस्प बना रहा है.
भिलाई-चरौदा में भूपेश बघेल के प्रभाव की अग्निपरीक्षा
चारों नगर निगमों में भिलाई-चरौदा का चुनाव राजनीतिक तौर पर सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाला है. यह इलाका पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के प्रभाव क्षेत्र के तौर पर देखा जाता है. इसलिए यहां का चुनाव केवल महापौर और पार्षदों के चयन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भूपेश बघेल की स्थानीय राजनीतिक पकड़ का भी आकलन करेगा.अगर भाजपा यहां मजबूत प्रदर्शन करती है और कांग्रेस के कब्जे को चुनौती देने में कामयाब होती है, तो इसे भूपेश बघेल के प्रभाव क्षेत्र में भाजपा की बड़ी राजनीतिक सेंध के तौर पर देखा जा सकता है. वहीं अगर कांग्रेस अपना कब्जा बरकरार रखती है, तो यह भूपेश बघेल और स्थानीय कांग्रेस संगठन के लिए मजबूत राजनीतिक संदेश होगा. यही वजह है कि भिलाई-चरौदा के नतीजों पर सिर्फ दुर्ग जिले की नहीं, बल्कि प्रदेश की राजनीति की भी नजर रहेगी.
रिसाली में ताम्रध्वज साहू की सियासी पकड़ की परीक्षा
रिसाली नगर निगम भी राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है. इस क्षेत्र को पूर्व गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू के प्रभाव वाले इलाके के तौर पर देखा जाता है.यहां कांग्रेस के सामने अपने पुराने राजनीतिक समीकरण और स्थानीय पकड़ को बनाए रखने की चुनौती होगी.भाजपा की कोशिश होगी कि संगठनात्मक ताकत और नए राजनीतिक समीकरणों के जरिए कांग्रेस के इस प्रभाव क्षेत्र में अपनी जमीन मजबूत की जाए. रिसाली के नतीजे यह संकेत देंगे कि ताम्रध्वज साहू की स्थानीय पकड़ कितनी मजबूत बनी हुई है और भाजपा यहां कांग्रेस के प्रभाव को कितना चुनौती दे पाती है. इसलिए रिसाली का चुनाव भी महज नगर निगम की सत्ता का चुनाव नहीं, बल्कि स्थानीय राजनीतिक प्रभाव बनाम संगठनात्मक ताकत की लड़ाई बनता नजर आ रहा है.
स्थानीय मुद्दे बनेंगे चुनावी हथियार
निकाय चुनावों में बड़े राजनीतिक नारों से ज्यादा असर स्थानीय समस्याओं का होता है. सड़क, पानी, सफाई, नाली, जल निकासी, स्ट्रीट लाइट, ट्रैफिक, आवास और रोजगार जैसे मुद्दे सीधे शहर के मतदाता से जुड़े हैं.ऐसे में दोनों दलों की चुनावी रणनीति में स्थानीय मुद्दों की बड़ी भूमिका रहने वाली है.भिलाई और भिलाई-चरौदा जैसे औद्योगिक इलाकों में रोजगार, प्रदूषण और बुनियादी सुविधाएं चुनावी बहस का हिस्सा बन सकती हैं. वहीं रिसाली और बिरगांव में पेयजल, सफाई, सड़क, नाली और शहरी विकास जैसे मुद्दे मतदाताओं के बीच प्रभावी हो सकते हैं.कांग्रेस स्थानीय समस्याओं के साथ स्मार्ट मीटर, बिजली बिल और जनसमस्याओं को मुद्दा बनाने की तैयारी में है. पार्टी सरकार पर वादाखिलाफी और जनहित के मुद्दों की अनदेखी के आरोपों के जरिए भाजपा को घेरने की कोशिश करेगी.
